को
शत्रु बोध
- लिंक पाएं
- X
- ईमेल
- दूसरे ऐप
ॐ
कापालिको का परिचय - प्राचीन समय में इस संप्रदाय की प्रभुता और महता बहुत ही अधिक थी । यह एक उग्र तान्त्रिक संप्रदाय था जिसके अनुयायी माला , अलंकार कुण्डल , चूड़ामणि भस्म और यज्ञोपवीत ये छह मुद्रिकाएं ( चिन्ह) धारण करते थे । ये लोग मनुष्यो की हड्डियों की माला पहनाते थे श्मशान में रहते थे और आदमियों की खोपाड़ियो में भोजन करते थे । परन्तु किसी विचित्र योग के अभ्यास से उन्हें विचित्र सिद्धियां प्राप्त थी । इनकी पूजा बड़े उग्र रूप की थी । ये शंकर के उग्र रूप महाभैरव के उपासक थे । इनकी पूजा में मद्य , मांस आदि का पर्याप्त व्यवहार होता था। इनके उपास्य देव महाभैरव का स्वरूप बड़ा उग्र तथा भयानक था । ये लोग आग में मनुष्य के मांस की आहुति देते थे, ब्रह्माण के की बलि दिया करते थे । शंकराचार्य के समय में इन कापालिकों का बड़ा प्रभाव था । क्योंकि १३१ ई ० के एख शिलालेख से पता चलता है कि चालुक्य वंशी राजा पुलकेशु द्वितीय के पुत्र नागवर्धन ने कमालेश्वर की पूजा के लिए बहुत सी जमीन दानरूप में दी थी ।
ऐसे तान्त्रिक क्षेत्र में शंकराचार्य को अपने वैदिक मार्ग का प्रचार करना था । उन्होंने भगवान मल्लिकार्जुन तथा भगवती भ्रमराम्बा की बड़े अनुराग से पूजा की और दिनों तक यहां निवास किया । वे अपने शिष्यों को भाष्य पढ़ाते , अद्वैत मार्ग का उपदेश देते और अवैदिक
____________________________________
प्रबोध चन्द्रोदय में इनकी सिद्धियां का बड़ा ही सुन्दर वर्णन किया है
हरिहर सुरज्येठ श्रेष्ठान्सुरानहमाहरे ,
वियति वहता नक्षत्राणां रूणध्मि गतीरपि ।
सगगनगरीभ पूर्णा विधाय महीमिमां ,
प्रबोध चन्द्रोदय अंक ३ श्लोक ,१४
मस्तिष्ककान्त्रवसाविभूरिमहामांसाहुर्जुह्रता
ब्रहौ ब्रहाकपाल कल्पितसुरानेन न: पारण ।
रच्यो न पुरूषोपहरिवलिभिर्देव महाभैरव,:
प्रबोध चंद्रोदय
मतो के सिद्धांतो की नि: सारता भलीभांति दिखलाते । कापालिक - जैसे अवैदिक पन्थ का खण्डन उनका प्रधान लक्ष्य था । विद्वान लोग शंकर की ओर झुकने लगे । वहां की जनता शंकर के उपदेशों को सुनकर कापालिक मत छोड़कर वैदिक मार्ग में अनुराग दिखलाने लगी कापालिकों ने देखा कि एक महान अतर्कित विघ्न उपस्थित हुआ । परन्तु उसमें ऐसा कोई विद्वान न था जो शंकर की युक्तियों का उत्तर देता । पराजय के साथ ही साथ इन कापालिकों की प्रतिहिंसा ( बदला) की प्रवृत्ति भी बढ़ने लगी । तर्क से हारकर उन्होंने कर्कश तलवार का आश्रय लिया । इनके नेता का नाम उग्रभैरव । उसने शंकर को मार डालने की अच्छी युक्ति निकाली । वह इनका शिष्य बन गया - साधारण शिष्य नहीं बल्कि उग्र शिष्य । धीरे धीरे वह आचार्य शंकर का प्रिय पात्र बन गया । अवसर पाकर उसने शंकर से अपना गूढ़ अभिप्राय कह सुनाया कि भगवन ! मैं विषय परिस्थिति में हूं । मुझे एअ अलौकिक सिद्वि प्राप्त होने में एक क्षुद्र विघ्न उपस्थित हो गया है । मुझे बलि देने के लिए राजा या किसी सर्वज्ञ पण्डित का सिर चाहिए ।पहला तो मुझे मिल नहीं सकता है और दूसरी आपकी अनुकंपा पर अवलम्बित है । आपसे बढ़कर इस जगत में ही कौन? इसलिए आप अपना सिर मुझे दे दिजिए । शंकराचार्य ने गूढ़ अभिप्राय से भरे हुए वचनों को सुना । परन्तु परोपकारी जीव थे उन्होंने इस बात की स्वीकृति दे दी परन्तु इस कापालिक को सावधान कर दिया कि मेरे शिष्यों के सामने कभी इस बात की चर्चा न करें । मुझे डर है कि वे प्रस्ताव को कभी स्वीकार न करेंगे । कल जब अकेला रहूं तो तुम आना और मैं अपना सिर तुम्हें दे दूंगा दूसरे दिन वह कापालिक हाथ में त्रिशूल लेकर ,माथे में त्रिपुंड धारण कर हड्डियों की माला को गले से लटकाए हुए, शराब की मस्ती में लाल -लाल आंखें घुमाता हुआ शंकराचार्य के निवास स्थान पर आया । उस समय विद्यार्थी लोग दूर चले गये थे । आचार्य एकान्त में बैठे हुए अभ्यास में लीन थे ।
उस भैरवाकार कापालिक को देखकर उन्होंने शरीर छोड़ने का निश्चय कर लिया । अपने अन्त: करण को एकाग्र कर के योगासन पर ध्यान - मुद्रा में बैठ गये । प्रणब का जप करते हुए उन्होंने अपनी इन्द्रियों को उनके व्यापार से हटाया और निर्विकल्प समाधि में जा विराजे । आचार्य को बिल्कुल एकान्त में देखकर उस कापालिक ने अपनी कामना पूरी करनी चाही । परन्तु पद्यपाद - जैसे विलक्षण बुद्विवाले शिष्य को वह ठग न सका । उन्हें उस कापालिक की दुरभिसन्धि का कुछ पता चल गया था । उग्रभैरव ने तलवार को शंकराचार्य का सिर काटने के लिए ज्यो उठाया त्यो ही पद्मपाद वहां अकस्मात उपस्थित हो गये और त्रिशूल की नोंक से उसका काम तमाम कर डाला । उग्रभैरव का पराजय कापालिक मत के नाश का श्रीगणेश था देखते ही देखते यह कापलिक मत श्रीपर्वत के प्रदेश से उच्छिन्न हो गया । इस प्रकार अद्वैत विजय दुन्दुभि सर्वत्र बजने लगी ।
_________________________
उग्रभैरव के पराजय के विशेष विवरण के लिए देखिए ,माधव शंकर दिग्विजय - सर्ग सदानन्द शंकर विजय सर्ग १०
आनंदगिरि ने कापालिक के पराजय की घटना का उल्लेख अपने ग्रंथ में नहीं किया है ।
जय श्री कृष्ण
दीपक कुमार द्विवेदी
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें