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गोकर्ण ( चिद्० मा०)- यह बम्बई प्रान्त का प्रसिद्ध शिवक्षेत्र है । गोवा से लगभग ३० मील पर यह नगर समुद्र के किनारे स्थित है । यहां के शिव का नाम महाबलेश्वर है जिनके दर्शन के लिए शिवरात्रि के समय बड़ा उत्सव होता है। कुबेर के समान सम्पत्ति पीने की इच्छा से रावण ने अपनी माता कैकसी की प्रेरणा से यही घोर तपस्या की थी तथा अपना मनोरथ सिद्ध किया था। महाभारत काल में भी यह मान्य तीर्थक्षेत्र था। यहां अर्जुन ने तीर्थयात्रा की थी । कालिदास ने भी गोकर्णेश्वर को वीणा बजाकर प्रसन्न करने के लिए नारद जी आकाश मार्ग से जाने का उल्लेख किया है ।
-( मा० सर्ग १२, चिद०,२२ प्रक०) ।
चिदम्बर ( चिद० आ०) - यह दक्षिण भारत का प्रधान शैव तीर्थ क्षेत्र है । महादेव की आकाश मूर्ति यही विद्यामान । यहां का विशालकाय शिवमन्दिर दक्षिणी स्थापत्यकला का उत्कृष्ट उदाहरण है । नटराज की अभिराम मूर्ति आरम्भ में यही मिली थी । इस मन्दिर की एक विशिष्टता यह भी है कि इसके उपर नाट्यशास्त्र में वर्णित हस्तविक्षेप के चित्र है। इन चित्रों के परिचय मे नाट्यशास्त्र के ततत श्लोक उट्टंकित किये गए हैं । आनन्दगिरि की सम्पत्ति में शंकर का जन्म यही हुआ था , परन्तु यह मात ठीक नहीं है इसका खण्डन हमने चरित के प्रसंग में कर दिया है - ( चिद ० २७ आद्य ० आन० २ प्रक०)
जगन्नाथ - सप्तपुरियो में यह अन्यतम पुरी है। उड़ीसा देश में समुद्र तट पर इसकी स्थिति है। यह पुरी के है नाम से विख्यात है । यही कृष्ण बलराम और सुभद्रा की काष्ठमयी प्रतिमाएं हैं । हमारे चार धामों में यह भी प्रधान धाम है । शंकराचार्य ने यहां अपना गोवर्धन पीठ स्थापित किया - ( चिद० अध० ३०, आ० ५५ प्रकरण)
द्वारिका - भारत के पश्चिम समुद्र के तीर पर द्वारिकापुरी विराजमान हैं । यहां आचार्य ने अपना पीठ स्थापित किया जो शारदापीठ के नाम से विख्यात है। माधव ने यहां पांचरात्र मतानुयायी वैष्णव की स्थिति बतलायी है - ( चिद ० ३१ अ० आन० प्र० ५५ मा० सर्ग,३५)
नैमिष ( मा०) - यह वही स्थान है जहां ऋषियों के प्रश्नों के उत्तर में सूत ने नाना प्रकार की पौराणिक कही। यह स्थान उतर प्रदेश में ही लखनऊ से उतर पूर्व में सीतापुर जिले में है आज भी यह तीर्थस्थल माना जाता है ।
पण्डरपुर - ( चिद्०) इस स्थान पर पाण्डुरंग की प्रसिद्ध प्रतिमा है । महाराष्ट्र देश में सबसे अधिक विख्यात वैष्णव क्षेत्र है। यह प्रसिद्ध मंत्र है - पुण्डरीक वरदे विट्ठल। विट्टलनाथ कृष्ण के ही रूप है । शंकर ने पाण्डुरंग की स्तुति में एक स्तोत्र भी लिखा है।
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आगच्छत स सिद्व्यर्थ गोकर्णस्याश्रम शुभम। वाल्मिकी ,उतर १/४६ ।
अथ रोधसि दक्षिणोदधे श्रितगोर्णनिकेतमीश्वरम ।
उपवीर्णयितु ययौ रूवेरूदगावृतिपथेन नारदा : रघु ० ८/३३
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प्रयाग - माधव ने त्रिवेणी के तट पर मीमांसक कुमारिल भट्ट के साथ शंकर के भेट करने की बात कही लिखी है । इसका विस्तृत वर्णन पहले किया गया है। आनन्दगिरि ने वरुण ,वायु आदि के उपासक शून्यवादी बराहमतानुयायी ,लोक गुण सांख्य योग तथा वैशषिक मत वादियों के शास्त्रार्थ करने की घटना का उल्लेख किया है ।
पांचल ( मा०), - शंकर के इस देश में जाने का समान्य ही उल्लेख मिलता है । यह प्रान्त आधुनिक उतर प्रदेश में गंगा यमुना के दोआब का उतरी भाग है । महाभारत में इस देश की विशेष महिमा दीख पड़ती है। उस समय यहां राजा द्रुपद थे जिनकी पुत्री द्रौपदी पाण्डवों की पत्नी थी ।
बदरी - यह उत्तराखण्ड का प्रसिद्ध तीर्थक्षेत्र है । इस स्थान से शंकराचार्य का विशेष सम्बन्ध है । यहां भगवान के विग्रह की स्थापना तथा वर्तमान पद्धति से उनकी अर्चा का विधान आचार्य के द्वारा किया गया है इस विषय का पर्याप्त विवेचन पीछे किया गया है। आनन्दगिरि के कथननुसार शंकर ने यहां तप्तकुंड का पता लगाकर अपने शिष्यों के शीतजानित कष्ट का निवारण किया था ।
बाहि्क ( मा०) - माधव के आचार्य के यहां जाने का समान्य रूप से उल्लेख किया है। यह स्थान भारतवर्ष की पश्चिमी उतरी सीमा के बाहर था । बैक्टीरिया के नाम से इस देश की प्रसिद्धि इतिहास ग्रन्थों में मिलती है ।
भवानी नगर ( आ०) - यह दक्षिण भारत कोई शक्ति पीठ प्रतीत होता है । वर्तमान समय में इसकी स्थिति का विशेष परिचय नहीं मिलता । आनन्दगिरि ने गणवपुर के अन्तन्तर आचार्य के यहां जाने का उल्लेख किया है । यहा शक्ति की उपासना का विशेष रूप से प्रचलित थी । इसके समीप ही कुबलयपुर नामक कोइ ग्राम था, जहां लक्ष्मी के उपासकों की बहुलता थी ्वो
यहां रहते समय आचार्य ने शक्ति की तमास पूजा का विशेष रूप से खण्डन किया और इस मत के अनुयायियों की सात्विक पूजा दीक्षा दी ( आ० प्रक० ११-२२)
मथुरा ( चिद मा०) - चिद विलास का कहना है कि आचार्य अपने शिष्यों के साथ यहां आये थे गोकुल तथा वृन्दावन में इन्होंने निवास किया था। हमने पहले लिखा है कि आचार्य के कुल देवता भगवान श्रीकृष्णचंद्र थे अतः कृष्ण चरणारविन्द से पवित्रता तीर्थ में आना तथा निवास करना सर्वथा समुचित है । शंकराचार्य को केवल शकरोपसक मानना नितांत अनुचित है।
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आनन्दगिरि - शं० वि ( ३५-४२ प्रकरण)
चिदविलास अध्याय ३१;
साधु वृन्दावनासक्तं बृन्दावनमुदैक्षत।।७।।
ततोऽसौ मथुरां प्राप मथुरां नगरी हरे ।
ततो गोकुलमापासौ तत्रैकं दिगमास्तित: ।।८।।
जय श्री कृष्ण
दीपक कुमार द्विवेदी
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