वर्तमान समय में विभिन्न विचारधाराओं का प्रचलन है, जिनमें "पंथ" और "वाद" जैसे शब्द जुड़ने से विचारधाराएं संकीर्ण हो जाती हैं। एक विचारधारा अक्सर दूसरी को सहन नहीं कर पाती, जिससे वैचारिक संघर्ष और टकराव की स्थिति उत्पन्न होती है। कई विचारधाराओं में अपने सिद्धांतों को दूसरों पर थोपने का प्रयास होता है, जिससे हिंसा और असहमति का माहौल बनता है। उदाहरण के लिए, इस्लाम, वामपंथ और ईसाई धर्म के कुछ तत्व अपनी विचारधारा को सर्वोच्च मानते हैं और अन्य विचारों को अस्वीकार करते हैं, मानते हैं कि जो उनके विचारों का अनुसरण न करें, उन्हें जीवित रहने का अधिकार नहीं है।
सनातनी विचारधारा: सभी को समाहित करने वाली एक सार्वभौमिक विचारधारा
इस प्रकार की विचारधाराओं के बीच, "सनातनी" एक ऐसी व्यापक विचारधारा है जो सभी को समाहित करने की शक्ति रखती है। "सनातन" का अर्थ ही शाश्वत है, अर्थात इसका न तो कोई आरंभ है, न ही कोई अंत। जैसे विभिन्न नदियाँ समंदर में मिलकर अपने अस्तित्व को खोए बिना समंदर का हिस्सा बन जाती हैं, वैसे ही सनातनी विचारधारा भी विविध मतों और विचारों को अपने भीतर समाहित करती है, बिना अपने मूल स्वरूप को बदले। सनातनी विचारधारा की विशेषता यह है कि यह सबको स्वीकार करने वाली है और "वसुधैव कुटुंबकम्" (संपूर्ण विश्व एक परिवार है) जैसे सार्वभौमिक सिद्धांत को अपनाती है।
सनातनी विचारधारा की यह व्यापकता इसे सभी विचारधाराओं का आधार बनाती है और समय के साथ इसकी प्रासंगिकता बढ़ती जाती है। सृष्टि के निर्माण से लेकर अब तक अनेक युग और मन्वंतर बीत चुके हैं, और सनातनी विचारधारा ने अपने मूल सिद्धांतों का पालन करते हुए समय के साथ अनेक परिवर्तन देखे हैं। इसी कारण, सनातनी समाज में भी समय-समय पर नवाचार और समायोजन होते रहे हैं।
वामपंथ, दक्षिणपंथ और केंद्रवादी विचारधाराओं का विश्लेषण
वामपंथी विचारधारा सामाजिक और आर्थिक समानता पर जोर देती है, ताकि समाज में कोई भी व्यक्ति पिछड़ा या शक्तिहीन न रहे। परंतु संसाधनों के समान विभाजन की व्यवहारिकता को लेकर वामपंथ में अस्पष्टता है। वामपंथ में वर्ग संघर्ष का सिद्धांत है, जो समाज को शोषक और शोषित में बाँट देता है। इसके परिणामस्वरूप समाज में हिंसा और वैमनस्य उत्पन्न होता है।
दक्षिणपंथी विचारधारा परंपराओं और सामाजिक संरचना को बनाए रखने पर जोर देती है। यह विचारधारा मानती है कि समाज में वर्गीकरण प्राकृतिक और आवश्यक है, जिससे समाज में संतुलन बना रहता है। वहीं, केंद्रवादी विचारधारा वामपंथ और दक्षिणपंथ के बीच संतुलन बनाने की बात करती है, जिससे समाज में संतुलित बदलाव हो सके।
सनातनी विचारधारा का त्रिगुणात्मक सृष्टि सिद्धांत
सनातनी विचारधारा के अनुसार सृष्टि त्रिगुणात्मक है - सत्त्व, रजस और तमस। यह तीन गुण पूरी सृष्टि को संचालित करते हैं। सत्त्व गुण शांति, ज्ञान और संतुलन का प्रतीक है; रजस गुण सक्रियता और ऊर्जा का प्रतीक है; और तमस गुण निष्क्रियता और अज्ञान का प्रतीक है। इन तीन गुणों के संतुलन से ही सृष्टि की रचना और विकास होता है। मानव जीवन में इन गुणों का प्रभाव उसके विचार, व्यवहार और जीवनशैली को निर्धारित करता है।
कर्म सिद्धांत और भगवान श्रीकृष्ण का संदेश
भगवान श्रीकृष्ण का कर्म सिद्धांत, जो भगवद गीता में वर्णित है, सनातनी विचारधारा का मुख्य स्तंभ है। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि "कर्म करो, फल की चिंता मत करो।" इसका अर्थ है कि व्यक्ति को अपने कर्म में संलग्न रहना चाहिए और निष्काम भाव से अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए। यह सिद्धांत व्यक्ति को अपने जीवन में धैर्य, सहिष्णुता और उदारता के साथ जीने का मार्गदर्शन देता है। कर्म की महत्ता का यह सिद्धांत व्यक्ति को नैतिकता, सत्यनिष्ठा और परिश्रम के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है, जो उसे मोक्ष की ओर ले जाने में सहायक है।
सनातनी विचारधारा वर्तमान परिप्रेक्ष्य में
वर्तमान समय में सनातनी विचारधारा की प्रासंगिकता और भी बढ़ गई है। जब समाज में वैचारिक संघर्ष और असहिष्णुता की स्थिति है, तब सनातनी विचारधारा "सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः" के सिद्धांत पर आधारित होकर मानवता के कल्याण की प्रेरणा देती है।
सनातनी विचारधारा: एक समावेशी, सहिष्णु और कल्याणकारी दृष्टिकोण
सनातनी विचारधारा चार मुख्य स्तंभों - धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष - के आधार पर जीवन का उद्देश्य समझाती है। यह जीवन के समग्र दृष्टिकोण पर आधारित है और इसमें सहिष्णुता, करुणा और सहअस्तित्व की भावना अंतर्निहित है। यहाँ समाज को गुण और कर्म के आधार पर वर्गीकृत किया गया है, जाति या वर्ग के आधार पर नहीं। इसके साथ ही सनातनी व्यवस्था में कुटीर उद्योग, उद्यमिता और शोध को उच्च स्थान दिया गया है, जिसमें सभी को समान अवसर और सम्मान प्रदान किया गया है।
सनातनी विचारधारा को सभी विचारधाराओं की जननी इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह मानवता को एक व्यापक दृष्टिकोण प्रदान करती है। यह किसी "वाद" की सीमाओं में बंधी हुई नहीं है। सनातनी विचारधारा का सिद्धांत "वसुधैव कुटुंबकम्" संपूर्ण विश्व को एक परिवार मानता है। वामपंथ, दक्षिणपंथ और केंद्रवाद जैसे विचार इस व्यापकता और सहिष्णुता के सामने सीमित प्रतीत होते हैं। सनातनी विचारधारा हर प्रकार के वर्ग संघर्ष, हिंसा और विभाजन से ऊपर उठकर समस्त समाज के कल्याण का मार्ग दिखाती है।
यह विचारधारा न केवल एक जीवन शैली है, बल्कि शाश्वत सत्य है, जो प्रत्येक जीव को उसके जीवन के वास्तविक उद्देश्य को समझने में सहायक है। जब तक यह सृष्टि है, तब तक सनातनी विचारधारा और इसके सिद्धांत अस्तित्व में रहेंगे। यही कारण है कि सनातनी विचारधारा को सभी विचारधाराओं की जननी कहा जाता है।
जय श्री कृष्ण
दीपक कुमार द्विवेदी
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