ब्रह्म सत्य है, जगत मिथ्या है।
जगह के समस्त द्रव्य, दर्शन, दृश्य को मिथ्या मानना मिथ्यावाद है। इस संबंध में न्याय दर्शन ने बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया है।
मिथ्यावाद को मानने वाला यह कहता है कि इस संसार में यह सब कुछ जो दर्शनीय है वह मायाजनित है, वास्तव में ब्रह्म के अतिरिक्त किसी का अस्तित्व नहीं। सब के सब अविद्या, मिथ्या और झूठ। इस जीव में भी जो पञ्चमहाभूत, इंद्रियाँ, शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा है उसमें से आत्मा के अतिरिक्त सब कुछ मिथ्या है अर्थात् मन, इंद्रियां और बुद्धि भी मिथ्या।
न्याय मत ने इस पर प्रश्न करते हुए कहता है कि जो जीव के बुद्धि विवेचन, तार्किकता, मन, इंद्रिय आदि को ही मिथ्या मान लेगा तो इसका स्पष्ट अर्थ यह है कि वह इंद्रिय, मन, बुद्धि और स्मृति जन्य प्रमाणों को भी मिथ्या मान लेगा। ऐसी परिस्थिति में दो प्रकार की समस्या खड़ी हो जाएगी, प्रथम यह कि जिसने ख़ुद के बुद्धि विवेचन को ही अविद्या मान लिया, उसके उस अविद्यायुक्त बुद्धि के इस विवेचन को भला सत्य कैसे माना जाय कि जगत मिथ्या है?? वस्तुतः जिस प्रकार ऋण में ऋण का गुणा करने पर धन आता है (- x - = +) उसी प्रकार मिथ्यावादी के बुद्धि द्वारा जगत को मिथ्या कहना जगत को सत्य ठहरा देगा। दूसरी समस्या यह है कि प्रमाण में प्रत्यक्ष, अनुमान, उपनाम और शब्द प्रमाण आते हैं। प्रत्यक्ष इंद्रियजनित ज्ञान है, अनुमान और उपनाम आंशिक प्रत्यक्ष के साथ स्मृति एवं बुद्धि विवेचना पर स्थिर हैं। ऐसे में जब आप इंद्रिय, उसके सूचना संवाहक मन और बुद्धि विवेचन को मिथ्या ठहरा देंगे तो कोई भी बात बिना प्रमाण के सिद्ध करनी होगी और किसी बात को बिना प्रमाण स्वीकार करना स्वयं में मिथ्या अर्थात् ग़लत है।
अतः इस समस्या को सुलझाने के लिये धीरे धीरे मिथ्यावाद की व्याख्या में कुछ व्यवहारिक परिवर्तन लाया गया। वस्तुतः कोई भी दर्शन जब समस्या में आता है तो वह सांख्य दर्शन की शरण में जाता है जहां प्रकृति (अर्थात् जड़) एवं वह प्रकृति जिस पदार्थ से पूरित है अर्थात् पुरुष (चेतना) दोनों को सत्य माना गया है। ऐसा माना जाता है है कि जब जड़ पर चेतन का आरोपण होता है तो जीव बनता है। चेतन अर्थात् पुरुष का समय के डायमेंशन से कोई लेना देना नहीं है, वह स्थिर है जबकि जो प्रकृति है वह समय के डायमेंशन में चलती रहती है अतः वह परिवर्तनशील है। अतः जगत के मिथ्या का न्याय द्वारा जो विरोध किया गया उसके परिप्रेक्ष्य में नया विवेचन प्रस्तुत किया गया है। इसके अनुसार जब जगत को मिथ्या कहा जाता है तो इसके पीछे का भाव यह नहीं है कि वास्तव में यह जगत है ही नहीं। इसके पीछे का भाव बस इतना ही है कि जगत में जो दृश्य है वह स्थायी नहीं है, आज कुछ है और कल कुछ। अतः जो बार बार बदल रहा है वह नियम का अनुपालन नहीं कर रहा। नियमों के अनुसार न चलने की दृष्टि से इसे मिथ्या कहा गया है ताकि जीव के भीतर की आत्मा इससे मन न मिलाये। जगत मिथ्या का अर्थ आत्यंतिक अभाव अर्थात् परमशून्यता नहीं है।
किसी भी दर्शन में जब समस्या आती है तो उसकी शरणस्थली हमेशा सांख्य दर्शन बनता है। न्याय वैशेषिक सांख्य का तार्किक विरोध करते हैं पर मोक्ष अथवा कैवल्य के लिए अंत में सांख्य आधारित योग दर्शन पर आश्रित हो जाते हैं। यहाँ तक कि पिछली चर्चा में मैंने ज़िक्र किया था कि बौद्धों का महायान जब नागार्जुन के माध्यमिक शून्यवाद से विज्ञानवाद की तरफ़ गया तो उन्होंने भी चित्त के वृत्तियों के निरोध अर्थात् योग मार्ग को ही साधन के रूप में चुना। इसी कारण सांख्य दर्शन सभी दर्शनों में सबसे प्रमुख एवं प्रभावशाली माना जाता है।
डॉ भूपेन्द्र सिंह
लोकसंस्कृति विज्ञानी
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