मैंने कुछ समय से एक बात नोट की है कि इस देश में हिंदुत्व के लिए लोग बहुत कुछ करना चाहते हैं

मैंने कुछ समय से एक बात नोट की है कि इस देश में हिंदुत्व के लिए लोग बहुत कुछ करना चाहते हैं और इसके लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। इस कार्य में हिंदू समाज का एक बड़ा प्रबुद्ध वर्ग भी शामिल है, जो आर्थिक और सामाजिक सहयोग देने को तत्पर है। बहुत से लोग कहते हैं कि वे हिंदू संगठन बनाएंगे और अपने स्तर पर कार्य करेंगे। लेकिन इस अधीरता के कारण वे यह समझ नहीं पाते कि नए संगठन या नई संस्था खड़ा करने में कितनी ऊर्जा और संसाधन लगते हैं।
इससे बेहतर होगा कि जो संगठन पहले से कार्यरत हैं, उन्हें और अधिक सशक्त और संगठित किया जाए। जो लोग हिंदुत्व विचारधारा के लिए कार्य कर रहे हैं, उन्हें मजबूत किया जाए और आर्थिक एवं सामाजिक रूप से उनका सहयोग किया जाए। धर्म के नाम पर संगठन बनाना आसान है, और लोग आर्थिक और सामाजिक सहयोग भी करेंगे, लेकिन उस संगठन को लंबे समय तक बनाए रखना बहुत कठिन होता है।

उदाहरण के लिए, हनुमान चालीसा के नाम पर मोहल्ला स्तर की छोटी-छोटी टोलियां बना ली जाती हैं, लेकिन उनमें वही लोग शामिल होते हैं जो पहले से मंदिर जाते हैं। हनुमान चालीसा, पूजा, और कर्मकांड एक कांग्रेसी या कम्युनिस्ट भी कर सकता है। लेकिन जब हिंदुत्व और राष्ट्रीय विमर्श की बात आएगी, तो वही लोग सनातनियों के विरुद्ध खड़े नजर आएंगे। इसलिए इस बात की गंभीरता को समझते हुए, जो संगठन पहले से कार्य कर रहे हैं, उन्हें मजबूत करना ही सर्वोत्तम है।

कई लोगों की यह शिकायत रहती है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को 100 वर्ष होने को आए, इतने बड़े संगठन और उसके 150 से अधिक अनुसांगिक संगठनों के बावजूद संघ कुछ नहीं कर पा रहा है। हिंदू समाज को पीटा जा रहा है, मारा जा रहा है। ऐसी शिकायतें करने वाले लोगों के पास स्वयं कोई दिशा नहीं होती। वे केवल धर्म के नाम पर आर्थिक सहयोग जुटा सकते हैं या धार्मिक अनुष्ठान आयोजित कर सकते हैं। लेकिन हिंदू समाज के शारीरिक, मानसिक, और आर्थिक विकास के लिए या समाज के चरित्र और व्यक्तित्व निर्माण के लिए उनके पास कोई ठोस योजना नहीं होती।

इस कारण ऐसे संगठन बुलबुले की तरह उठते हैं और कुछ वर्षों में समाप्त हो जाते हैं। जहां तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की बात है, तो लोगों को उसकी कार्यशैली के बारे में जानकारी नहीं है। यहां तक कि संघ के कुछ वरिष्ठ पदाधिकारी भी भटक जाते हैं और कहते हैं कि संघ से कोई अपेक्षा न रखें, क्योंकि संघ कुछ नहीं कर पाएगा। लेकिन उन्हें यह भी नहीं पता कि संघ का मूल कार्य व्यक्ति निर्माण करना है। संघ का एक ही मंत्र है:
"संघ कुछ करता नहीं, स्वयंसेवक कुछ छोड़ता नहीं।"

संघ के स्वयंसेवकों को यह समझना चाहिए कि संघ में जो प्रशिक्षण और दायित्व उन्होंने ग्रहण किया है, उसके आधार पर वे अपने स्तर पर छोटे-छोटे प्रकल्प और समूह बनाकर हिंदू समाज के समग्र विकास के लिए कार्य कर सकते हैं।

हम और आप क्या कर सकते हैं?

इस प्रश्न का उत्तर समझने के लिए संघ के इस मंत्र को अपने जीवन में उतारना होगा:
"संघ कुछ करता नहीं, स्वयंसेवक कुछ छोड़ता नहीं।"
यदि कोई व्यक्ति साप्ताहिक हनुमान चालीसा या सुंदरकांड का प्रकल्प चला रहा है और बच्चों में संस्कार देने का कार्य कर रहा है, तो वह इससे आगे बढ़कर अपने गांव या शहर में 10 ऐसी टोलियां बनाकर एक बड़ा "सेल्फ डिफेंस ट्रेनिंग सेंटर" खोल सकता है।
यहां हिंदू समाज के लोग शारीरिक, मानसिक, और बौद्धिक विकास के लिए कार्य कर सकते हैं।

जो लोग आर्थिक रूप से सक्षम हैं, वे एक-दो हिंदू परिवारों को गोद लेकर उनकी शिक्षा और रोजगार की व्यवस्था कर सकते हैं।
प्रशासनिक सेवा में कार्यरत अधिकारी 10 हिंदुनिष्ठ युवाओं को स्थायी या अस्थायी रोजगार दिलाने में मदद कर सकते हैं।
उद्यमी और व्यवसायी हिंदुनिष्ठ युवाओं को रोजगार मुहैया कराने के साथ-साथ 10 से 100 युवाओं का कौशल विकास (स्किल डेवलपमेंट) करवाकर उन्हें अपना स्वरोजगार और अपना व्यवसाय करने के योग्य बना सकते हैं।

यदि यह भी संभव न हो, तो जो संगठन हिंदू समाज के लिए कार्य कर रहे हैं, उन्हें तन-मन-धन से सहयोग करें।
इन छोटे-छोटे प्रयासों से हिंदू समाज शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, और सामाजिक रूप से बहुत सशक्त हो जाएगा और अपनी लड़ाई स्वयं लड़ने में सक्षम बन सकेगा।

दीपक कुमार द्विवेदी

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