कांग्रेस और भारत-विरोधी शक्तियों के संवैधानिक राष्ट्रवाद का सामना धार्मिक राष्ट्रवाद के माध्यम से किया जा सकता है। इसलिए, हमें हर मंच पर यह मांग करनी चाहिए कि संविधान की प्रस्तावना से आपातकाल के दौरान 42वें संशोधन के तहत जोड़े गए 'धर्मनिरपेक्ष' और 'समाजवाद' शब्दों को हटाया जाए। मूल प्रस्तावना को यथावत रखा जा सकता है, या उसमें महर्षि अरबिंदो के उत्तरपाड़ा में दिए गए ऐतिहासिक भाषण के एक अंश को जोड़ा जाए, जिसमें उन्होंने कहा था कि "राष्ट्र धर्म सनातन है।" इसके अलावा, 'समाजवाद' शब्द की जगह 'रामराज्य' को प्रस्तावना में शामिल किया जाना चाहि
भारतीय राष्ट्रवाद का आधार सनातन वैदिक धर्म है, जो एक विशाल वटवृक्ष के समान है, जिसकी अनगिनत शाखाएँ और उपशाखाएँ समस्त समाज को अपने छत्रछाया में समेटे हुए हैं। इस संदर्भ में महर्षि अरबिंदो ने कहा था:
"जब-जब सनातन धर्म का उत्थान होता है, तब-तब भारत का उत्थान होता है; और जब सनातन धर्म की अवनति होती है, तब-तब भारत की अवनति होती है।"
इस कथन से यह स्पष्ट होता है कि भारत की आत्मा और उसकी संस्कृति सनातन धर्म में निहित हैं।
वैदिक और अवैदिक परंपराओं के बीच विभाजन को इतना गहरा नहीं किया जाना चाहिए कि वह समाज में विघटन का कारण बने। यह समझना आवश्यक है कि सनातन वैदिक धर्म उस वटवृक्ष की भाँति है, जिसकी जड़ें गहरी और स्थायी हैं, जबकि बौद्ध, जैन और अन्य लोक परंपराएँ उसकी विविधतापूर्ण शाखाएँ हैं। इन शाखाओं का सम्मान करना हमारा कर्तव्य है, क्योंकि यही विविधता सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति की विशेषता है।
यह स्मरण रखना आवश्यक है कि "भारत का राष्ट्र धर्म सनातन है।" महर्षि अरबिंदो ने बंगाल के उत्तरपाड़ा में दिए अपने ऐतिहासिक भाषण में जो विचार प्रस्तुत किए थे, उन्हें भारत के संविधान की प्रस्तावना में यथोचित स्थान दिया जाना चाहिए। विशेष रूप से, "सेकुलर" और "समाजवाद" जैसे शब्दों के स्थान पर यह उद्घोषित करना चाहिए कि:
"भारत एक धर्मनिष्ठ राष्ट्र है, और इसका धर्म सनातन है।"
"समाजवाद" की जगह रामराज्य शब्द को संविधान की प्रस्तावना में सम्मिलित किया जाना चाहिए। ऐसा करने से ही भारत और सनातन धर्म, दोनों का सम्यक् उत्थान संभव होगा।
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