भारत कभी भी सच्चे अर्थों में विकसित नहीं बन सकता, जब तक कि 20% मुस्लिम आबादी को सही रास्ते पर नहीं लाया जाता, क्योंकि उनका एकमात्र उद्देश्य ‘ग़ज़वा-ए-हिंद’ है। उनका विश्वास है कि जब तक हिंदू को पराजित नहीं किया जाएगा, तब तक वे विश्व को इस्लामिक नहीं बना सकते। मुस्लिमों समेत सभी अब्राहमिक धर्मों का यह विश्वास है कि भारत की भूमि देवभूमि है। इस भूमि पर अधिपत्य करना, दुनिया पर विजय प्राप्त करने के समान है। मुस्लिमों समुदाय की आसमानी किताब मुस्लिम और गैर-मुस्लिम में भेद करती हैं और कहती हैं कि गैर-मुस्लिमों को जीवित रहने का अधिकार नहीं है, यदि जीवित रहना है तो जजिया कर या दास बनकर रहना होगा। ऐसे में, कोई कैसे यह अपेक्षाएँ कर सकता है कि मुस्लिमों में कोई परिवर्तन संभव होगा?
भारत विभाजन के बाद भारत के सड़कों पर एक नारा गूंजा था: “लड़कर लिया पाकिस्तान, हंसकर लेंगे हिंदुस्तान।” यह उनकी मानसिकता को स्पष्ट रूप से दर्शाता है। नागरिकता संशोधन अधिनियम के समय 'चिकन नेक' काटने की बात, हिंदुओं की शोभायात्राओं पर पथराव, नूपुर शर्मा का सिर तन से जुदा करने के नारे, नूपुर शर्मा का समर्थन करने पर कन्हैया दर्जी की हत्या, उमेश कोल्हे की हत्या, और विभाजन के बाद आज तक, अलग-अलग क्षेत्रों में दंगे होते रहे हैं। यह स्पष्ट करता है कि मुस्लिम भारत को दारुल इस्लाम बनाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं।
जब राष्ट्रधर्म सनातन नहीं रहेगा, तो विकसित भारत की कल्पना कैसे की जा सकती है? कट्टरपंथी इस्लाम के खतरे को नजरअंदाज करके हम एक विकसित भारत की बात नहीं कर सकते। इसी तरह की आत्मघाती बातें स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भी की गई थीं, जब कहा गया था—"हिंदू-मुस्लिम एकता के बिना भारत को स्वतंत्रता नहीं मिल सकती।" परिणामस्वरूप भारत का विभाजन हुआ और उसके पूर्व व बाद में 20 लाख हिंदुओं का नरसंहार इस्लामी जिहादी भीड़ द्वारा किया गया। 1971 में पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांगलादेश) में 30 लाख हिंदुओं का नरसंहार हुआ। आज भी बांगलादेश में हिंदुओं का नरसंहार हो रहा है। फिर भी हमारे नेता और हिंदू संगठनों के प्रमुख कहते हैं कि बिना हिंदू-मुस्लिम एकता के भारत का विकास संभव नहीं है। इस सोच का परिणाम 1947 से भी अधिक भयावह हो सकता है।
मनुस्मृति के संदर्भ में, हिंदू धर्म में कोई भी ग्रंथ ऐसा नहीं है जिसे अंतिम सत्य माना जाए। उदाहरण के लिए, ब्रह्मसूत्र की रचना सृष्टि के आदि में हुई थी, परंतु इस पर भाष्य आदि शंकराचार्य जी ने सातवीं सदी में लिखा था। इसके अलावा, ब्रह्मसूत्र पर कई टिप्पणियाँ और टीकाएँ लिखी गईं। हमारे समाज ने समय के साथ कई सुधार किए हैं, जैसे सती प्रथा का उन्मूलन। हिंदू समाज ने अपनी परंपराओं में सुधार किए हैं, लेकिन सनातन धर्म और हिंदू संस्कृति के ऊपर पिछले 1200 वर्षों से निरंतर हमले हो रहे हैं, जो आगे भी जारी रहेंगे। कारण यह है कि भारत पर विजय प्राप्त किए बिना पूरी दुनिया पर विजय प्राप्त करना असंभव है। सनातन धर्म और भारत विरोधी शक्तियों के लिए पिछले तीन हजार वर्षों से भारत को जीतने का प्रयास एक दुर्लभ सपना रहा है। वे जीत भी गए, फिर भी हिंदू समाज को गुलाम नहीं बना पाए। हजार वर्षों की गुलामी के कालखंड बावजूद, भारत की हिंदू आबादी में 14% मतांतरित हुई थी अंग्रेजों के ढाई सौ वर्ष के शासन के बाद सिर्फ 2.50% आबादी मतांतरित हुई है लेकिन स्वतंत्रता के बाद यह संख्या तेजी से बढ़ी है। भारतीय उपमहाद्वीप में मुस्लिम आबादी 40% के आसपास हो गई है और क्रिश्चियन भी 10% बढ़ गए हैं। रेडिकल लेफ्ट का प्रभाव भी बढ़ा है, जिससे खतरा और भी बढ़ा है। यह सब स्वतंत्रता के बाद हुआ है। इस समस्या का समाधान कोई नहीं देख रहा है। हम बात करते हैं विकसित भारत की, लेकिन ढाई मोर्चों के खतरे को नज़रअंदाज़ करते हैं। जब तक हम सत्य को स्वीकार नहीं करेंगे, यह कहते रहेंगे कि "हिंदू-मुस्लिम एकता के बिना भारत का विकास नहीं हो सकता," तो हम इस खतरे को और बढ़ाएंगे। विकसित भारत बनाने से पहले हमें आंतरिक सुरक्षा मोर्चे पर काम करना पड़ेगा।
आपातकाल के दौरान, जब विपक्ष के सभी नेता जेल में थे, इंदिरा गांधी ने 42वां संविधान संशोधन किया और मूल संविधान की प्रस्तावना को बदलकर उसमें ‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘समाजवाद’ शब्द जोड़े। यदि हमें सनातन धर्म और भारतवर्ष को बचाना है तो हमें मूल संविधान की प्रस्तावना को लागू करने की मांग करनी होगी, या फिर संविधान की प्रस्तावना में राष्ट्रधर्म सनातन को शामिल करने की मांग करनी होगी।
भारत की आत्मा सनातन हिंदू धर्म है, और सनातन हिंदू धर्म रूपी वटवृक्ष को संरक्षित करने के लिए एक अखिल भारतीय सनातन धर्म रक्षा बोर्ड गठित करना चाहिए, जिसमें सभी मत और विचारधाराओं के लोग सम्मिलित हों और सनातन धर्म की रक्षा करें।
महर्षि अरविंद ने 1911 में बंगाल के उत्तरपाड़ा में दिए गए अपने ऐतिहासिक भाषण में कहा था, जिसे योगी आदित्यनाथ जी महाराज ने हाल ही में दोहराया, कि "राष्ट्रधर्म सनातन है। सनातन धर्म के बिना भारत का अस्तित्व संभव नहीं है। सनातन धर्म का उत्थान होता है, तो भारत का उत्थान होता है। सनातन धर्म की अवनति होती है, तो भारत की अवनति होती है।"
इन बातों को समझना होगा। अब्राहमिक मजहब, रिलिजन का तुष्टिकरण बंद करना चाहिए एंव भारत विरोधी सनातन विरोधी रोमन चर्च के नव स्वरूप वामपंथी विचारधारा को प्रश्रय देना बंद करना चाहिए। भारत विरोधी सनातन धर्म विरोधी किसी भी शक्ति का जड़मूल के उन्मूलन करना पड़ेगा उसके आलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं ये लोग कभी नहीं सुधर सकते। इनकी श्रद्धा न तो भारत राष्ट्र के लिए है, न सनातन वैदिक धर्म के लिए। उनका एकमात्र उद्देश्य इस भूमि से हिंदू और हिंदू मतों के अनुयायियों को समाप्त करना है। जिस देश में ऐसी असहिष्णु विचारधाराएँ निवास करती हैं, उस देश को विकसित नहीं बनाया जा सकता है।
भारत को सही मायने में विकसित बनाना है तो संविधान की प्रस्तावना को बदलकर मूल संविधान की प्रस्तावना को लागू करना होगा। सनातन वैदिक धर्म के संरक्षण की बात करनी होगी। हिंदू समाज को अपने शिक्षण संस्थान खोलने की स्वतंत्रता देनी होगी। यदि ऐसा हुआ तो हिंदू समाज अपनी राख से खड़ा होने की क्षमता रखता है। यदि यह नहीं किया गया, तो विकसित भारत एक दूर की कौड़ी रहेगा, क्योंकि कभी लाहौर, कराची, सिंध समृद्ध थे। जब राष्ट्रधर्म सनातन का लोप हुआ तो आज उनका क्या हाल है, यह सब जानते हैं। सनातन हिंदू धर्म का उत्थान ही भारत को विकसित बना सकता है।
✍️दीपक कुमार द्विवेदी
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