जातिगत विभाजन से समरसता तक: समाज के पुनर्निर्माण की आवश्यकता



वर्तमान समय में यह प्रश्न उठता है कि भेद प्रकृति में है क्योंकि यह सृष्टि त्रिगुणात्मक है। यह तथ्य पूर्णत: सत्य है, किंतु इसे आम लोगों तक उनकी भाषा में पहुँचाना अत्यंत कठिन कार्य है। अत: हमें अपने स्तर पर समाधान निकालने के प्रयास करने होंगे।

पिछले दो-तीन सौ वर्षों में हिंदू समाज की 85% आबादी को यह बताया गया कि "तुम आदिवासी हो, तुम दलित हो, तुम पिछड़े हो; और शेष 15% ने तुम्हारा शोषण किया है।" यह नैरेटिव विशेष रूप से दक्षिण भारत और आदिवासी क्षेत्रों में प्रभावी हुआ है। उत्तर भारत में यह असर अपेक्षाकृत कम रहा, क्योंकि यहाँ का समाज इस्लामिक आक्रांताओं से लंबे समय तक संघर्षरत रहा। उत्तर भारत में जातीय विभाजन का स्तर भी उतना गहरा नहीं था। किंतु दक्षिण भारत में आर्य-द्रविड़ विवाद और आदिवासी क्षेत्रों में मूलनिवासी, यादव, कुर्मी तथा तथाकथित अनुसूचित जातियों के बीच बौद्धवाद और अंबेडकरवाद के नाम पर विष घोलने का कार्य विगत 70-80 वर्षों में किया गया। सोशल मीडिया ने इस प्रवृत्ति को और अधिक गति दी है।

अब क्षत्रिय समाज को भड़काया जा रहा है। कांग्रेस और अन्य वामपंथी शक्तियाँ क्षत्रियों को "मूल निवासी" कहकर सनातन धर्म के विरुद्ध खड़ा कर रही हैं। यह सांस्कृतिक मार्क्सवाद का नैरेटिव है, जिसका प्रभाव रोकने के लिए हमें सोचना होगा। अतिवाद के बिना समाधान की दिशा में बढ़ना आवश्यक है।

नाथ संप्रदाय और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने 1960 से 1990 के दशक में "एक मंदिर, एक कुआँ, सहभोज" जैसे प्रयोग किए थे, जिन्होंने समाज को एकजुट करने में बड़ी भूमिका निभाई। दुर्भाग्यवश, ऐसे प्रयोग अब नहीं हो रहे हैं, जिससे वामपंथियों के लिए समाज में और अधिक विभाजन पैदा करना आसान हो गया है।

1991 में उदारीकरण के पश्चात एक बड़ा वर्ग गाँवों से शहरों की ओर निकला, जिससे जातिगत विभाजन काफी हद तक कम हुआ। किंतु मंडल आयोग की सिफारिशों के लागू होने के बाद क्षेत्रीय दलों के उदय ने जातिवादी और सामाजिक विभाजन को पुन: बढ़ावा दिया। जो आज स्वयं को "बौद्ध" और "मूल निवासी" कह रहे हैं, उन्हें मंडल आयोग के लागू होने से ही राजनीतिक लाभ मिला था।

विभाजन की आग और समाधान का मार्ग
जिस देश में बहुसंख्यक समाज की 85% आबादी को "शोषित-वंचित-पीड़ित" और शेष 15% को "शोषक" बताया जाए, वहाँ विभाजन की आग फैलना स्वाभाविक है। इस आग को बुझाने का एकमात्र उपाय यह है कि समाज के तथाकथित "उच्च वर्ग" को "शोषित-वंचित" वर्गों को अपने निकट लाना होगा। इसके लिए हमें नाथ संप्रदाय और संघ के मार्ग का अनुसरण करना होगा।

एक मंदिर, एक श्मशान, सहभोज जैसे प्रयोग पुन: शुरू करने होंगे।

साप्ताहिक हनुमान चालीसा, सुंदरकांड, विष्णु सहस्रनाम का सामूहिक पाठ हो।

सभी जातियों के महापुरुषों की जन्म-जयंती और पुण्यतिथियों पर सर्वसमाज की भागीदारी सुनिश्चित हो।


यदि ऐसा किया गया तो निश्चित रूप से बड़ा परिवर्तन संभव है।

सरकार और तंत्र पर निर्भरता छोड़नी होगी
हमें समझना होगा कि वर्तमान सरकार और व्यवस्था पश्चिमी सेकुलरिज्म और समाजवाद के सिद्धांतों पर आधारित है। धर्म के अनुकूल शासन चलाना आज की राजनीतिक संरचना में आसान नहीं है। लोकतंत्र में केवल "51%" और "272 सीटें" ही मायने रखती हैं। इस कारण धर्म, नैतिकता और परंपरा की कोई विशेष भूमिका नहीं रहती।

हमें हिंदू संगठनों पर दबाव बनाना होगा और स्वयं के स्तर पर सनातनी मूल्यों तथा परंपराओं को संरक्षित करना होगा। समाज के उन लोगों को भी जोड़ना होगा, जो किसी कारणवश हमसे कट गए हैं।

वर्णाश्रम व्यवस्था का महत्व
वर्णाश्रम व्यवस्था का कोई विकल्प नहीं है। इसे हमें हिंदू जनमानस को व्यावहारिक और सरल भाषा में समझाना होगा। सोलह संस्कार, पूर्वजन्म का सिद्धांत और "बेटी-मंदिर" हमें बचाएंगे। लोकतंत्र, संविधान, सेकुलरिज्म, समाजवाद और पर्यावरण हमें नहीं बचा सकते। यही संदेश महर्षि दयानंद सरस्वती, महर्षि अरविंद, स्वामी विवेकानंद, महात्मा गांधी, वीर सावरकर और परम पूज्य गुरुजी विगत दो सौ वर्षों से दे रहे हैं।

यदि हम अपने महापुरुषों और विचारकों के संदेशों को सही संदर्भ में नहीं समझ पाए, तो कोई परिवर्तन संभव नहीं होगा।

✍️दीपक कुमार द्विवेदी

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