कांग्रेस की दोगली राजनीति: अपमान, स्वार्थ और झूठ का सहारा"।

 कांग्रेस की दोगली राजनीति: अपमान, स्वार्थ और झूठ का सहारा



कांग्रेस पार्टी के इतिहास को जब हम बारीकी से देखते हैं, तो एक सिलसिला नज़र आता है जिसमें अपने राजनीतिक स्वार्थ को साधने के लिए पार्टी ने ऐतिहासिक व्यक्तियों, नेताओं और विचारकों का उपयोग किया, अपमान किया, और बाद में उन्हें अपना बताकर सहानुभूति जुटाने का प्रयास किया। यह दोहरे चरित्र की राजनीति न केवल उनके नेतृत्व की कमजोरी को उजागर करती है, बल्कि पार्टी के राष्ट्रहित के प्रति उपेक्षापूर्ण रवैये को भी स्पष्ट करती है।

 कांग्रेस पार्टी का इतिहास उन घटनाओं और व्यक्तित्वों से भरा हुआ है, जिनके साथ पार्टी ने अपने राजनीतिक स्वार्थ और परिवारवाद को प्राथमिकता देते हुए भेदभाव किया। नेताओं और विचारकों के योगदान को दरकिनार कर, कांग्रेस ने उन्हें या तो अपमानित किया या उनके नाम का उपयोग कर राजनीतिक सहानुभूति अर्जित करने का प्रयास किया।

मनमोहन सिंह बनाम पी.वी. नरसिम्हा राव का मामला

काग्रेस ने अपने ही नेताओं के प्रति भेदभाव की पराकाष्ठा दिखाते हुए, पूर्व प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव के निधन के बाद उनकी शवयात्रा को दिल्ली में उचित सम्मान नहीं दिया। कांग्रेस कार्यालय में उनके पार्थिव शरीर को प्रवेश तक नहीं दिया गया, और उनका अंतिम संस्कार मजबूरी में उनके गृह राज्य में करना पड़ा। इसके विपरीत, मनमोहन सिंह जी के निधन पर कांग्रेस पार्टी ने उन्हें सम्मान देने का दिखावा करते हुए भाजपा सरकार पर आरोप लगाए। यह वही मनमोहन सिंह थे जिन्हें पार्टी ने एक 'रिमोट-कंट्रोल' प्रधानमंत्री के रूप में उपयोग किया, जबकि उनके कार्यकाल में वास्तविक निर्णय सोनिया गांधी और उनके परिवार द्वारा लिए जाते थे।

नेहरू और बाबा साहब आंबेडकर का विरोधाभास

डॉ. भीमराव आंबेडकर को कांग्रेस ने जीवनकाल में अपमानित किया। नेहरू ने बाबा साहब को चुनाव हराने के लिए हर संभव प्रयास किए। इसके बावजूद, कांग्रेस आज बाबा साहब के नाम का सहारा लेकर दलित समुदाय की सहानुभूति अर्जित करने का प्रयास कर रही है। यह दिखाता है कि कांग्रेस ने ऐतिहासिक व्यक्तित्वों का उपयोग केवल राजनीतिक लाभ के लिए किया है।

सरदार पटेल के साथ नेहरू का भेदभाव

सरदार वल्लभभाई पटेल, जिन्होंने भारत के एकीकरण में अभूतपूर्व योगदान दिया, उनके साथ भी कांग्रेस नेतृत्व ने भेदभाव किया। सरदार पटेल को नेहरू ने हमेशा अपनी राजनीतिक प्राथमिकताओं के नीचे रखा। प्रधानमंत्री पद के लिए पटेल को दरकिनार कर नेहरू को चुना गया, जो गांधीजी के दबाव का नतीजा था। पटेल की दूरदृष्टि और नेतृत्व क्षमता के बावजूद उन्हें वह सम्मान नहीं दिया गया, जिसके वे अधिकारी थे।

सुभाषचंद्र बोस और कांग्रेस का व्यवहार

सुभाषचंद्र बोस, जिन्होंने भारत की स्वतंत्रता के लिए आज़ाद हिंद फौज की स्थापना की, कांग्रेस के भेदभावपूर्ण रवैये का शिकार बने। बोस ने जब कांग्रेस अध्यक्ष पद का चुनाव जीता, तब गांधीजी और नेहरू ने उनके नेतृत्व को स्वीकारने से इनकार कर दिया। उनके क्रांतिकारी दृष्टिकोण और स्वतंत्रता संग्राम में योगदान को कांग्रेस ने हमेशा कमतर आंका। बोस के साथ कांग्रेस का यह व्यवहार दर्शाता है कि पार्टी अपने भीतर विचारधारात्मक विविधता को स्थान देने में असफल रही।

कांग्रेस का भारत रत्न और सम्मान का स्वार्थपूर्ण खेल

नेहरू और इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री रहते हुए भारत रत्न दिया गया, लेकिन सरदार पटेल और सुभाषचंद्र बोस जैसे महान नेताओं को इस सम्मान से वंचित रखा गया। सरदार पटेल को भारत रत्न मिलने में दशकों की देरी हुई, और सुभाषचंद्र बोस को यह सम्मान कभी नहीं मिला। यह दर्शाता है कि कांग्रेस ने राष्ट्रीय सम्मान को भी परिवारवाद और राजनीतिक स्वार्थ के आधार पर परिभाषित किया।


स्वार्थपूर्ण सहानुभूति और जनता को गुमराह करने की राजनीति में कांग्रेस शुरू से माहिर है कांग्रेस की राजनीति का आधार सहानुभूति और भ्रम फैलाना रहा है। चाहे वह दलित समुदाय के साथ दिखावटी अपनापन हो, सरदार पटेल और सुभाषचंद्र बोस के योगदान को कमतर दिखाना हो, या बाबा साहब के नाम का उपयोग कर आंदोलन खड़ा करना, कांग्रेस ने हमेशा अपने राजनीतिक स्वार्थ को प्राथमिकता दी है।


मेरा यह लेख कांग्रेस के दोहरे चरित्र को उजागर करने हेतु लिखा है और इस बात की ओर ध्यान दिलाना चाहता हु कि कांग्रेस पार्टी ने किस प्रकार अपने स्वार्थ के लिए राष्ट्र के महान नेताओं और विचारकों के साथ अन्याय किया। यह समय है कि देश इस दोगली राजनीति को पहचानकर सच्चाई के साथ खड़ा हो।



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