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सनातन धर्म
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भारतीय सनातन संस्कृति अपने अद्वितीय वैदिक ज्ञान, परिवारवादी मूल्यों, और धार्मिक परंपराओं के कारण विश्व के लिए आदर्श रही है। वर्तमान समय में, जब विधर्मी शक्तियां हिंदू संस्कृति को कमजोर करने के लिए षड्यंत्रकारी नरेटिव चला रही हैं, युवाओं को पाश्चात्य प्रभाव और बहनों को लव जिहाद जैसी समस्याओं से बचाने के लिए एक संगठित और सुदृढ़ प्रयास आवश्यक हो गया है।
हिंदू समाज को अपने धर्म, संस्कृति और परंपराओं की रक्षा तथा प्रचार हेतु सबसे पहले स्वयं आत्मनिर्भर और जागरूक बनना होगा। आत्मनिर्भरता का अर्थ केवल आर्थिक स्वावलंबन से नहीं है, बल्कि अपनी जड़ों से जुड़ना और अपनी सभ्यता के महान आदर्शों को समझकर उन्हें जीवन में उतारना है। इसके लिए भगवान श्रीराम, श्रीकृष्ण, भगवान महावीर, और महर्षि वाल्मीकि जैसे महान व्यक्तित्वों के जीवन चरित्र हमारे लिए प्रेरणा के स्रोत हैं।
धर्म और संस्कृति की शिक्षा:
धर्म और संस्कृति की रक्षा का पहला कदम है शिक्षा। वेद, पुराण और उपनिषदों का अध्ययन केवल पंडितों और विद्वानों तक सीमित न रहे, बल्कि आम जनमानस को भी इसकी सरल और प्रभावशाली शिक्षा दी जाए। परिवार के स्तर पर बच्चों को छोटी उम्र से ही रामायण, महाभारत और भगवद गीता की कहानियां सुनाने की परंपरा पुनर्जीवित करनी चाहिए।
युवाओं को प्रेरित करना:
युवाओं को पाश्चात्य संस्कृति के अंधानुकरण से बचाने के लिए उन्हें यह समझाना होगा कि सनातन धर्म केवल धार्मिक आचरण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की सर्वोत्तम पद्धति है। भगवद गीता का कर्मयोग और श्रीकृष्ण का संदेश—"स्वधर्मे निधनं श्रेयः"—युवाओं को अपने कर्तव्यों के प्रति प्रेरित कर सकता है।
महिलाओं का सम्मान और सुरक्षा:
सनातन धर्म ने हमेशा महिलाओं को शक्ति और सम्मान का प्रतीक माना है। देवी दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती के रूप में हम उनकी पूजा करते हैं। परिवारों में बेटियों और बहनों को यह शिक्षा दें कि वे अपनी संस्कृति पर गर्व करें और बाहरी प्रभावों से बचें। साथ ही, समाज में महिलाओं की सुरक्षा और सशक्तिकरण के लिए ठोस कदम उठाए जाएं।
सामाजिक और पारिवारिक मूल्यों का पुनर्जीवन:
पारिवारिक और सामाजिक मूल्यों का ह्रास ही समाज को कमजोर बनाता है। एक आदर्श समाज का निर्माण तभी संभव है जब परिवार के सदस्य एक-दूसरे का सहयोग और सम्मान करें। माता-पिता को अपने बच्चों के साथ संवाद बढ़ाना चाहिए और उन्हें सिखाना चाहिए कि उनका धर्म और संस्कृति ही उनकी असली पहचान है।
आध्यात्मिकता को जीवन का हिस्सा बनाना:
आधुनिक जीवन की चुनौतियों से लड़ने के लिए ध्यान और योग जैसे साधनों का प्रचार-प्रसार किया जाए। श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है, "योगस्थः कुरु कर्माणि" अर्थात योग के माध्यम से ही व्यक्ति अपने जीवन में संतुलन और सफलता प्राप्त कर सकता है।
विधर्मी नरेटिव का खंडन:
विधर्मी शक्तियों द्वारा फैलाए जा रहे झूठे नरेटिव का सत्य और तर्क के आधार पर खंडन करना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। इसके लिए सोशल मीडिया, लेखन और जनसंपर्क जैसे माध्यमों का प्रयोग किया जाए।
वैश्विक स्तर पर सनातन संस्कृति का प्रचार:
सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रचारित करने के लिए भारतीय मूल्यों और योग, आयुर्वेद, और वास्तुशास्त्र जैसे विषयों का प्रचार किया जाए। इसका प्रभावी उपयोग दुनिया के हर कोने में हमारी संस्कृति की पहचान बनाएगा।
आज का युग चुनौती और अवसर दोनों का युग है। यदि हम भगवान श्रीराम के त्याग, श्रीकृष्ण की बुद्धिमत्ता और संतों-महापुरुषों के आदर्शों को अपने जीवन में उतार सकें, तो एक ऐसा हिंदू समाज खड़ा कर सकते हैं जो प्राचीन सभ्यता को जीवंत रखेगा। यह समय जागने का है, क्योंकि जो अपनी संस्कृति की रक्षा नहीं कर सकता, वह अपने अस्तित्व को भी सुरक्षित नहीं रख सकता।
लेखक
महेंद्र सिंह भदौरिया
राष्ट्रीय विचारक
बहुत बहुत शानदार आलेख
जवाब देंहटाएं🚩
जवाब देंहटाएं🙏❤️🔥🙏
जवाब देंहटाएंजय श्री राम बहुत ही सुंदर सभी युवाओं को सनातनी बंधु भगनियों को इस विषय को आत्मसात करना चाहिए
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