आर्थिक सुधारों के असली नायक: पी.वी. नरसिम्हा राव या डॉ. मनमोहन सिंह?



आर्थिक सुधारों को लेकर आम धारणा यह है कि उनका श्रेय डॉ. मनमोहन सिंह को दिया जाता है, लेकिन अगर हम भारतीय राजनीति और अर्थव्यवस्था के इतिहास को ध्यान से देखें, तो यह स्पष्ट होता है कि असली श्रेय पी.वी. नरसिम्हा राव को जाना चाहिए। राव ने न केवल भारतीय राजनीति के पारंपरिक दृष्टिकोण को चुनौती दी, बल्कि उन्होंने तत्कालीन आर्थिक संकट से उबरने के लिए साहसिक कदम उठाए थे। जबकि डॉ. मनमोहन सिंह का योगदान केवल उन सुधारों को लागू करने तक सीमित था, जिन्हें पी.वी. नरसिम्हा राव ने प्रारंभ किया था।

गांधी नेहरू परिवार और यथास्थितिवादी नीतियाँ

आर्थिक सुधारों का श्रेय मनमोहन सिंह को इसलिए दिया गया, क्योंकि वे गांधी-नेहरू परिवार के करीबी थे और उनके समर्थक थे। गांधी परिवार ने हमेशा यथास्थितिवादी नीतियों को प्राथमिकता दी और कभी भी बड़े आर्थिक सुधारों को प्रोत्साहित नहीं किया। गांधी परिवार का प्रभाव और कांग्रेस पार्टी की राजनीति ने भारतीय समाज और अर्थव्यवस्था को कई दशकों तक एक स्थिर, अनम्यता की स्थिति में रखा। 1991 में जब भारत को गंभीर आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा और उसे अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) से मदद की आवश्यकता थी, तब प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव ने इस संकट का सामना करने के लिए ठोस सुधारों की दिशा में कदम उठाए।

पी.वी. नरसिम्हा राव और आर्थिक सुधार

पी.वी. नरसिम्हा राव के प्रधानमंत्री बनने के बाद भारत को गंभीर आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा। भारत के पास आयात के लिए धन की कमी थी और विदेशी मुद्रा भंडार लगभग खत्म हो चुका था। इस संकट से निपटने के लिए राव ने आर्थिक सुधारों की शुरुआत की, जिनमें सरकारी नियंत्रण को कम करना, विदेशी निवेश को आकर्षित करना और व्यापार क्षेत्र में उदारीकरण जैसे महत्वपूर्ण कदम शामिल थे। इन सुधारों ने भारतीय अर्थव्यवस्था को नई दिशा दी और भारत को वैश्विक बाजार में एक मजबूत स्थिति प्रदान की।

राव के नेतृत्व में, भारतीय सरकार ने IMF की शर्तों के तहत सुधारों को लागू किया, लेकिन इन सुधारों को लागू करने के लिए राव की राजनीतिक इच्छाशक्ति और निर्णय क्षमता का बड़ा योगदान था। हालांकि, गांधी परिवार और कांग्रेस पार्टी ने इन सुधारों का विरोध किया, लेकिन राव ने उनकी आलोचना के बावजूद इन सुधारों को लागू किया।

भारत में आर्थिक सुधारों की पृष्ठभूमि: भारतीय अर्थव्यवस्था सोशलिस्ट नीतियों का दुष्प्रभाव 

"इस देश के आर्थिक सुधारों की पृष्ठभूमि को जानने के पहले इस बात को समझना अत्यधिक आवश्यक है कि इस देश ने स्वतंत्रता के बाद भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कम्युनिस्ट विचारधारा के प्रभाव में आकर सोवियत संघ से प्रेरित होकर पंचवर्षीय योजना के नाम पर 1955 से सोशलिस्ट आर्थिक नीतियों को अपनाया गया। उसके बाद 1967 में इंदिरा गांधी जी ने इन सोशलिस्ट नीतियों को और आगे बढ़ाया। बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया, जिसे 'गरीबों हटाओ' का नाम दिया गया। लेकिन इसका परिणाम यह हुआ कि नौकरशाही बहुत भ्रष्ट हो गई, जिसके कारण 1947 से 1990 तक भारत की आर्थिक वृद्धि दर 3.4% से ज्यादा कभी नहीं हुई। 1990 में यह स्थिति हो गई कि सात दिन के आयात खर्चे के लिए भारत के पास विदेशी मुद्रा भंडार नहीं बचा था, जिसके कारण भारत को सोना गिरवी रखना पड़ा।

डॉ. मनमोहन सिंह जी को आर्थिक सुधारों का श्रेय नेहरू गांधी परिवार द्वारा पोषित वामपंथी इको सिस्टम द्वारा दिया जाता है। उन्हें महान् अर्थशास्त्री बताया जाता है, लेकिन इसके पहले 1972 से 1976 तक डॉ. मनमोहन सिंह देश के मुख्य आर्थिक सलाहकार थे। उस वक्त महंगाई दर 1973 में 22%, 1974 में 20%, और 1975 में 25% थी। 1982 से 1985 तक वे रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के गवर्नर रहे, और 1985 से 1987 तक वे योजना आयोग के डिप्टी चेयरमैन रहे। लेकिन 1972 से 1990 तक मनमोहन सिंह ने कभी सोशलिस्ट कम्युनिस्ट आर्थिक नीतियों का विरोध नहीं किया, बल्कि उनका समर्थन किया।

एकाएक 1991 में क्या हुआ कि वे आर्थिक सुधार करने लगे? इससे स्पष्ट होता है कि पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव जी की दृढ़ इच्छाशक्ति के कारण ये आर्थिक सुधार लागू हुए। इसमें डॉ. मनमोहन सिंह की भूमिका सिर्फ कार्यान्वयन तक ही थी।

इसलिए वामपंथी इको सिस्टम हमेशा ऐसा 'फॉल्स गॉड' तैयार करता है, जिसके कारण गांधी नेहरू परिवार के कुकर्मों को ढंका जाता है, जिन लोगों ने भारत की आत्मा और आर्थिक सिद्धांतों के विपरीत अप्राकृतिक सोशलिस्ट आर्थिक मॉडल को लागू किया था, जिसके कारण भारत के कुटीर उद्योग और छोटे उद्यमी बर्बाद हो गए।

देश को नेहरू गांधी परिवार ने लाइसेंस-राज के नाम पर बंधक बना लिया था। उनकी सरकार की इच्छा के बिना कोई एक सुई भी नहीं बनती थी, जिसके कारण पूरी आर्थिक प्रगति बाधित हुई। लेकिन नेहरू गांधी परिवार द्वारा पोषित वामपंथी इको सिस्टम ने डॉ. मनमोहन सिंह को आर्थिक सुधारों का नायक बताकर गांधी नेहरू परिवार के कुकर्मों और पापों को ढक दिया था। इस सच को हर भारतीय को जानना चाहिए।"

डॉ. मनमोहन सिंह ने क्यों आर्थिक सुधार किये

1991 में वित्त मंत्री के रूप में डॉ. मनमोहन सिंह ने आर्थिक सुधारों को लागू किया, लेकिन उनका कार्य केवल IMF की शर्तों को लागू करने तक ही सीमित था। जब वे मुख्य आर्थिक सलाहकार और बाद में रिजर्व बैंक के गवर्नर के रूप में कार्यरत थे, तब उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था में कोई बड़े बदलाव नहीं जाते किए थे। वास्तव में, उनका योगदान तब हुआ जब उन्हें वित्त मंत्री के रूप में आर्थिक सुधारों को लागू करना था।

मनमोहन सिंह को अक्सर आर्थिक सुधारों के नायक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, लेकिन सच्चाई यह है कि वे उस समय के अंतरराष्ट्रीय वित्तीय परिपेक्ष्य के तहत सुधारों को लागू करने के लिए बाध्य थे। 1991 में भारत के वित्त मंत्री के रूप में उनके कार्यकाल में, IMF ने भारत को ऋण देने की शर्त पर सुधारों की योजना बनाई थी। मनमोहन सिंह ने इस योजना को कार्यान्वित किया, लेकिन उनका काम इस सुधार प्रक्रिया को केवल लागू करना था, जबकि असली श्रेय पी.वी. नरसिम्हा राव को जाता है, जिन्होंने इन सुधारों के लिए राजनीतिक साहस दिखाया और उन्हें कार्यान्वित करने का रास्ता प्रशस्त किया।

गांधी नेहरू परिवार वामपंथी इको सिस्टम की सुधार विरोधी मानसिकता
गांधी-नेहरू परिवार और कांग्रेस ने हमेशा आर्थिक सुधारों का विरोध किया है। 2021 में मोदी सरकार द्वारा कृषि सुधारों के लिए तीन कृषि कानून लाए गए थे, जो कृषि क्षेत्र में महत्वपूर्ण बदलाव की दिशा में थे। लेकिन गांधी परिवार और कांग्रेस ने किसानों के बीच अफवाहें फैलाकर इन कानूनों का विरोध किया। उन्होंने यह कहकर किसानों को डराया कि इन कानूनों से उनकी ज़मीन छिन जाएगी। इस विरोध के कारण कृषि सुधारों की दिशा में कई महत्वपूर्ण कदम रुक गए, और यह साबित हुआ कि गांधी परिवार का आर्थिक सुधारों के प्रति दृष्टिकोण हमेशा यथास्थितिवादी रहा है। यह बात उस समय भी स्पष्ट होती है, जब 1991 में गांधी-नेहरू परिवार से बाहर के पहले व्यक्ति, पीवी नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री बने थे। तब गांधी-नेहरू परिवार द्वारा पोषित वामपंथी इकोसिस्टम और वामपंथी दलों ने आर्थिक सुधारों के खिलाफ मोर्चा खोला। अटल बिहारी वाजपेयी और बीजेपी ने इन सुधारों का समर्थन किया, और अटल बिहारी वाजपेयी जी के समर्थन के कारण बड़े आर्थिक सुधार संभव हो पाए थे। कांग्रेस पार्टी ने यहां तक कि पीवी नरसिम्हा राव जी का अपमान भी किया। जब उनका देहांत हुआ था, तब सोनिया गांधी के इशारे पर उनके पार्थिव शरीर को कांग्रेस कार्यालय में प्रवेश नहीं करने दिया गया था। इसका कारण यह था कि पीवी नरसिम्हा राव जी ने भारत की अर्थव्यवस्था को समाजवादी दुष्चक्र से बाहर निकाला था। इसी कारण उन्हें कांग्रेस ने बार-बार अपमानित किया। यही नहीं, कांग्रेस ने उन्हें भारत रत्न तक नहीं दिया। 

अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में आर्थिक सुधारों की नई दिशा 

पीवी नरसिम्हा राव जी के द्वारा शुरू किए गए आर्थिक सुधारों को अटल बिहारी वाजपेयी जी ने अपने छह वर्ष (1999-2004) के कार्यकाल में और तेज़ी से आगे बढ़ाया। अटल जी के नेतृत्व में इंफ्रास्ट्रक्चर, बुनियादी ढांचे, और आर्थिक सुधारों में अभूतपूर्व बदलाव आए। उन्होंने स्वर्णिम चतुर्भुज योजना जैसी महत्वपूर्ण परियोजनाओं की शुरुआत की, जिससे देश के प्रमुख शहरों को बेहतर सड़क नेटवर्क से जोड़ा गया। इसके अलावा, उन्होंने सरकारी निजीकरण और वैश्वीकरण की दिशा में और कदम बढ़ाए, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था और मजबूत हुई। अटल जी ने विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए नीतियों में सुधार किए और व्यापार को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाया। उन्होंने विनिवेश प्रक्रिया को भी बढ़ावा दिया, जिससे सरकारी कंपनियों की दक्षता बढ़ी। अटल जी के आर्थिक सुधारों ने भारत की विकास दर को 8% तक पहुंचाया, जिससे देश की वैश्विक स्थिति में सुधार हुआ।


राजनीतिक हस्तक्षेप और आर्थिक सुधारों की उपेक्षा: डॉ. मनमोहन सिंह का शासन
जब 2004 में डॉ. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने, तब उन्होंने सोनिया गांधी द्वारा स्थापित असंवैधानिक राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (NAC) के अधीन कार्य करना स्वीकार किया। डॉ. मनमोहन सिंह केवल नाममात्र के प्रधानमंत्री थे, वास्तविक सत्ता सोनिया गांधी के हाथों में थी, और वे NAC के माध्यम से शासन चला रही थीं। हर छोटे-बड़े निर्णय में सोनिया गांधी का हस्तक्षेप रहता था, तथापि डॉ. मनमोहन सिंह ने कभी इसका विरोध नहीं किया। 2004 से 2014 के बीच भारत के पास आर्थिक क्षेत्र में एक स्वर्णिम अवसर था, किन्तु यह कालखंड भारत के इतिहास का सबसे भ्रष्ट समय सिद्ध हुआ। इस दौरान कोई बड़े आर्थिक सुधार नहीं किए गए। मनरेगा जैसी योजनाएँ, जो कम्युनिस्ट सोच पर आधारित थीं, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को विध्वंस और बर्बादी की ओर अग्रसर करने में अत्यन्त महत्वपूर्ण भूमिका निभाईं। अटल जी के समय 2004 में 8% की जीडीपी वृद्धि दर थी, जो 2014 आते-आते 4% पर संकुचित हो गई। बैंकिंग क्षेत्र में भी गंभीर संकट उत्पन्न हुआ। "फोन बैंकिंग" के माध्यम से 32 लाख करोड़ रुपये वितरित किए गए, जबकि 1947 से 2004 तक बैंकों ने केवल 18 लाख करोड़ रुपये का ऋण दिया था। 2004 से 2014 के बीच यह आंकड़ा 32 लाख करोड़ तक पहुंच गया, जिससे 2014 के बाद नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स (एनपीए) का संकट उत्पन्न हो गया। यदि 2014 के बाद मोदी सरकार ने बैंकिंग क्षेत्र को बचाने का प्रयास न किया होता, तो सम्पूर्ण बैंकिंग प्रणाली ढह जाती। प्रश्न यह उठता है कि जब डॉ. मनमोहन सिंह इतने बड़े अर्थशास्त्री थे, तो उन्होंने सोनिया गांधी के NAC का विरोध क्यों नहीं किया? 1991 में जो आर्थिक सुधार उन्होंने किए थे, उन्हें आगे बढ़ाने के स्थान पर NAC की समाजवादी नीतियाँ क्यों लागू की गईं? क्यों 2004 से 2014 तक कोई बड़े आर्थिक सुधार नहीं किए गए? इस दौरान कोयला घोटाला, 2G स्पेक्ट्रम घोटाला, और कॉमनवेल्थ घोटाला जैसे बड़े भ्रष्टाचार के मामले सामने आए, किन्तु डॉ. मनमोहन सिंह ने इन पर अंकुश लगाने का कोई प्रयास नहीं किया। जब वे 1991 में आर्थिक सुधार कर सकते थे, तो प्रधानमंत्री रहते हुए 2004 से 2014 तक सुधार क्यों नहीं किए? यह प्रश्न आज भी अनुत्तरित है।"

चीन और भारत: तुलनात्मक दृष्टिकोण

जब चीन ने 1977 में आर्थिक सुधारों की शुरुआत की थी, तब भारत में गांधी परिवार के नेतृत्व में संविधान में 'सेक्युलर' और 'सोशलिस्ट' शब्द डाले जा रहे थे। चीन ने अपने आर्थिक मॉडल को पूंजीवादी दिशा में मोड़ा और इसके परिणामस्वरूप चीन की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ी। भारत में, हालांकि, गांधी परिवार और उनके सहयोगियों ने समाजवादी दृष्टिकोण को प्राथमिकता दी, जिसके परिणामस्वरूप भारतीय अर्थव्यवस्था धीमी गति से बढ़ी।

आर्थिक सुधारों के असली नायक: पी.वी. नरसिम्हा राव की अद्वितीय भूमिका 
आर्थिक सुधारों के नायक आधुनिक भारत के निर्माता पूर्व प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव जी है भारत की अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने के लिए साहसिक कदम उठाए। डॉ. मनमोहन सिंह का योगदान केवल इन सुधारों को लागू करने तक सीमित था। गांधी परिवार और कांग्रेस की नीतियों ने कभी भी इन सुधारों को बढ़ावा नहीं दिया और हमेशा यथास्थितिवादी दृष्टिकोण अपनाया। इसके विपरीत, अटल बिहारी वाजपेयी और भाजपा ने इन सुधारों का समर्थन किया और भारत को वैश्विक मंच पर एक नया मुकाम दिलाने में मदद की। इस प्रकार, भारतीय राजनीति और अर्थव्यवस्था के संदर्भ में पी.वी. नरसिम्हा राव का योगदान अनमोल है और उन्हें ही इसके असली जनक के रूप में मान्यता मिलनी चाहिए।

✍️दीपक कुमार द्विवेदी

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