गणतंत्र दिवस 2025: भारतीय संस्कृति की पुनर्स्थापना का संकल्प

भारतीय इतिहास और राजनीति के विषय पर गणतंत्र दिवस के अवसर पर चर्चा करते समय हम अक्सर एक महत्वपूर्ण पहलू को नजरअंदाज कर देते हैं, और वह है हमारी महान सनातन संस्कृति और सभ्यता। हम भारतीय जनमानस की मानसिकता और आत्मगौरव को समझने के बजाय, केवल राजनीतिक और ऐतिहासिक घटनाओं पर ही ध्यान केंद्रित करते हैं। यह भूल जाते हैं कि भारतवर्ष की संस्कृति हजारों वर्षों पुरानी है और यह सभ्यता न केवल विश्व को एकता और समरसता का पाठ पढ़ाती है, बल्कि जीवन के प्रत्येक पहलू में संतुलन की खोज करती है।

बारह सौ वर्षों के गुलामी कालखंड के कारण हम अपनी महान् हिंदू सभ्यता और संस्कृति पर गौरवबोध करना भूल गए। इसके पीछे बारह सौ वर्षों के विदेशी आक्रमणों और शासनों ने हमारे आत्मगौरव को आघात पहुँचाया, और इस कारण हमें अपनी सनातन परंपराओं के प्रति हीनता का अनुभव हुआ। विशेष रूप से अंग्रेज़ी साम्राज्य के आगमन के बाद, हमें यह विश्वास दिलाया गया कि भारत का आधुनिक रूप अंग्रेज़ों ने दिया, जबकि उससे पूर्व भारत में केवल संघर्ष था, राजा आपस में लड़ते रहते थे, भारतीय असभ्य थे, और अंग्रेज़ों ने हमें सभ्य बनाया। इस प्रकार की धारणा स्थापित करके हमें यह मानने पर विवश कर दिया गया कि भारत का कोई प्राचीन और महान इतिहास नहीं था। इस कुंठा को कांग्रेसियों ने और भी बढ़ाया। कांग्रेस ने यह धारणा बनाने का प्रयास किया कि भारत का जन्म 1947 में हुआ, उससे पूर्व भारत अस्तित्वहीन था। इसे संवैधानिक राष्ट्रवाद और यथास्थितिवाद के नाम पर बहुत विकराल रूप दे दिया गया, विशेष रूप से हिंदू समाज को जाति, भाषा, और क्षेत्र के आधार पर इस प्रकार से लड़ाया गया कि हिंदू समाज अपने स्व, अर्थात् सनातन धर्म को ही भूल जाए। बहुत हद तक, संवैधानिक राष्ट्रवाद और यथास्थितिवाद को बढ़ावा देकर कांग्रेसियों ने अंग्रेज़ों द्वारा बनाई गई धारणा को और भी मजबूत किया,जिसके कारण यह मानसिकता और अधिक प्रबल हुई जो गुलामी के कालखंड के कारण में हमारे मन में विकसित हुई, आज भी हमें अपनी संस्कृति, परंपराओं और इतिहास के प्रति गौरव बोध से वंचित करती है । जब कोई व्यक्ति सनातन परंपराओं और भारतीय संस्कृति के गौरव की बात करता है, तो उसे हेय दृष्टि से देखा जाता है और उसका मज़ाक उड़ाया जाता है। यह स्थिति इसलिए उत्पन्न हुई है क्योंकि हम आज भी मानसिक रूप से गुलाम हैं, और हमें अपनी पुरानी परंपराओं पर गर्व महसूस नहीं होता।

हमें यह समझना होगा कि मुगलों और अंग्रेजों ने न केवल हमारे देश की राजनीतिक स्वतंत्रता को छीन लिया, बल्कि उन्होंने हमारी संस्कृति, सभ्यता और धार्मिक परंपराओं को भी नष्ट करने का प्रयास किया। उन्होंने मंदिरों को तोड़ा, शास्त्रों को नष्ट किया और हमारी ऐतिहासिक धरोहर को नष्ट करने के लिए कई उपाय किए। इन आक्रमणों ने भारतीय समाज को मानसिक रूप से कमजोर किया और उसकी गौरवशाली परंपराओं को भुलाने के प्रयास किए।

भारत की संस्कृति और सभ्यता आज की नहीं, अपितु लाखों और करोड़ों वर्षों पुरानी है। भारतीय पुराणों तथा ग्रंथों में सृष्टि के कालचक्र को कल्पों और मन्वंतर के रूप में वर्णित किया गया है। प्रत्येक कल्प में सृष्टि का निर्माण और प्रलय का समय चक्रीय रूप में होता है। भारतीय समयदृष्टि के अनुसार, एक कल्प की अवधि 4.32 अरब वर्ष मानी जाती है, और इस प्रकार सृष्टि का अस्तित्व अनंत काल से है।

हमारी प्राचीन सभ्यता की जड़ें हजारों वर्षों पुरानी हैं, जिसे वैदिक ग्रंथों, संस्कृत साहित्य और पुरातात्त्विक खोजों से प्रमाणित किया जा सकता है। उदाहरणस्वरूप, भारतीय विज्ञान, गणित, चिकित्सा, खगोलशास्त्र, और स्थापत्य कला में अत्यधिक उन्नति का प्रमाण प्राप्त होता है।

भारत की संस्कृति और सभ्यता का इतिहास केवल आज का नहीं, अपितु यह करोड़ों और लाखों वर्षों पुराना है, जिसे शब्दों में पूरी तरह व्यक्त करना कठिन है। हमारे यहाँ कल्पों और मन्वंतर की अवधारणा है, जो यह दर्शाती है कि सृष्टि की गति चक्रीय होती है। भारतीय दर्शन के अनुसार, प्रत्येक क्षण में लय और प्रलय होते हैं, जैसे हम सोते समय लय में प्रवेश करते हैं और जागने के पश्चात प्रलय से बाहर आते हैं। इस ब्रह्माण्ड में यह लय-प्रलय का क्रम निरंतर चलता रहता है।

भारत का कालबोध भी छह हजार वर्षों से कहीं अधिक गहरा और व्यापक है। प्राचीन भारतीय ग्रंथों में उल्लिखित 84 कल्पों के आधार पर सृष्टि का समयकाल अनंत और चक्रीय बताया गया है। यही कारण है कि पश्चिमी दृष्टिकोण से जो लोग पृथ्वी को केवल छह हजार वर्ष पुरानी मानते हैं, वे भारतीय सभ्यता के बारे में यह तर्क करते हैं कि इतनी प्राचीन और उन्नत सभ्यता कैसे अस्तित्व में आ सकती है। उनका यह तर्क तब खारिज हो जाता है, जब वे स्वीकार करते हैं कि सृष्टि की शुरुआत केवल छह हजार वर्ष पहले नहीं हुई, तो उनका स्थापित विचारधारा एक झटके में ध्वस्त हो जाता है।

यह एक तथ्य है कि भारतीय सभ्यता के प्रमाण प्राचीन साहित्य, पुरातात्त्विक खोजों और वैज्ञानिक सिद्धांतों में मिलते हैं, जो भारतीय संस्कृति को न केवल प्राचीन, बल्कि अत्यन्त विकसित भी सिद्ध करते हैं।

नैरेटिव अर्थात (धारणा) की बात को आगे बढ़ाते हुए यह कहा जा सकता है वामपंथी इतिहासकारों ने भारतीय इतिहास में जानबूझकर मिलावट की। उनका उद्देश्य था कि भारतीय समाज को अपनी गौरवमयी परंपराओं और इतिहास से विमुख किया जाए, ताकि लोग अपनी हजारों वर्षों की समृद्धि और संघर्ष की गाथाओं को भूलकर अपनी सांस्कृतिक पहचान से हीन हो जाएं। इस कार्य में उन्होंने भारतीय सभ्यता के प्रति उपेक्षापूर्ण दृष्टिकोण अपनाया, जिससे समाज में आत्मगौरव का ह्रास हुआ। यह गलत इतिहास रचनाएँ विशेष रूप से उस समय से शुरू हुईं, जब मैकाले ने भारतीय शिक्षा व्यवस्था को पूरी तरह से ध्वस्त करने के लिए अपनी योजना को अमल में लाया।

जब अंग्रेज़ भारत आए, तो उन्हें यह सोचने में कठिनाई हुई कि एक राष्ट्र जो ज्ञान, संस्कृति, और विज्ञान में इतना समृद्ध था, वह कैसे अस्तित्व में आया। उस समय भारत में सात लाख से अधिक गुरुकुल संचालित हो रहे थे, जहाँ न केवल वेद, वेदांग, उपवेद, धर्मसूत्र, स्मृतिग्रंथ और पुराणों की शिक्षा दी जाती थी, बल्कि शास्त्रकला, संगीतकला, शिल्पकला, मूर्तिकला, चित्रकला, ज्योतिषशास्त्र, गणित, चिकित्सा, और अन्य सभी विज्ञानों का अध्ययन भी होता था। यह व्यवस्था अत्यधिक सुव्यवस्थित थी, और इसे देखकर अंग्रेज़ चकित रह गए थे।

मैकाले ने एक सख्त आदेश जारी किया कि जो अंग्रेजी नहीं जानता, वह योग्य नहीं माना जाएगा, और उसे नौकरी नहीं मिल सकेगी। इस एक आदेश ने 99% भारतीयों को अशिक्षित बना दिया। इसके पश्चात अंग्रेज़ों ने धीरे-धीरे अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली को थोपते हुए भारतीय शिक्षा व्यवस्था को पूरी तरह से बदलने का प्रयास किया। हालांकि, वे इसे पूरी तरह से नष्ट करने में सफल नहीं हो पाए। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद, हमारी सरकार ने भी इस खंडित शिक्षा प्रणाली को अपनाया और गुरुकुलों की प्राचीन व्यवस्था को समाप्त कर दिया।

इस प्रकार, न केवल गलत इतिहास रचा गया, बल्कि भारतीय शिक्षा व्यवस्था को पूरी तरह से बदलकर उसमें विदेशी प्रभाव डाला गया। हिंदू समाज में हीनभावना का बीजारोपण किया गया और सांस्कृतिक गौरव की धारणा को कमजोर किया गया। यह प्रक्रिया आज भी जारी है, और यह हमारे लिए एक चुनौती है कि हम अपनी सांस्कृतिक धरोहर को पुनः जागृत करें और उसका सम्मान करें।

इस वर्ष हम लोग 76वां गणतंत्र दिवस मना रहे हैं और स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव भी मना रहे हैं। इस अवसर पर हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि हमने पिछले 80 से 85 वर्षों में क्या खोया है। आज़ादी के बाद हमने 24.3% आबादी को 40% भूभाग दे दिया, और उस मजहबी भीड़ ने पाकिस्तान बनाने के बाद भी भारत में ही रहकर पाकिस्तान के अस्तित्व को चुनौती दी। यह उस थाली में छेद करने जैसा है, जिसमें हम खाते हैं।

गणतंत्र दिवस पर हम अपने संविधान को मनाते हैं, जो 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ। यह संविधान भारतीय स्वभाव, संस्कृति और परंपराओं से प्रेरित नहीं था। इसे पश्चिमी दृष्टिकोण से लिखा गया था, जहां बौद्ध दर्शन का प्रभाव अत्यधिक था। संविधान में सम्राट विक्रमादित्य की शासन व्यवस्था का कोई उल्लेख नहीं है, न ही हमारे पारंपरिक कलेंडर की कोई स्थिति है।

हमारा सरकारी कलेंडर शक संवत के आधार पर है, जो ईसा के बाद की 78वीं शताब्दी में है, जबकि विक्रम संवत, जो ईसा के पूर्व का है, आज 2081 में चल रहा है। यह ग्रेगोरियन कलेंडर से 57 वर्ष आगे है, जबकि सृष्टि संवत और अन्य भारतीय परंपराएं इसके मुकाबले कहीं अधिक प्रमाणित और वैज्ञानिक हैं। फिर भी, हमने सरकारी कलेंडर के रूप में शक संवत को ही अपनाया।

संविधान में भगवान राम के आदर्शों का भी कोई उल्लेख नहीं किया गया। संविधान की मूल प्रति में प्रतीकात्मक रूप से राम दरबार दिखाई देता है, लेकिन भारतीय धर्म, संस्कृति और सनातन परंपरा का संविधान में कोई स्थान नहीं है। यह दर्शाता है कि हमारी सांस्कृतिक धरोहर को संविधान में उचित स्थान नहीं दिया गया, जबकि हमारी सभ्यता और इतिहास अत्यंत समृद्ध और गौरवमयी रहा है।

इंदिरा गांधी ने आपातकाल के दौरान 42वें संविधान संशोधन के माध्यम से संविधान की प्रस्तावना में संशोधन कर, समाजवाद और सेकुलरिज़्म शब्दों को सम्मिलित किया। इस संशोधन ने संविधान की मूल आत्मा को परिवर्तित करके उसे आब्रहमिकरण की दिशा में अग्रसर किया। इसके पश्चात, सेकुलरिज़्म और समाजवाद के नाम पर सामाजिक न्याय की अवधारणा ने समाज में विद्वेष के बीज बो दिए, जिसके परिणामस्वरूप समाज कभी एकजुट नहीं हो सका। भगवान राम की कृपा से राम मंदिर आंदोलन प्रारंभ हुआ। इस आंदोलन एवं आर्थिक उदारीकरण के प्रभावों के कारण हिंदू समाज को संगठित और एकजुट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। तथापि, सरकारों ने हिंदू समाज को विखंडित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। हिंदू समाज को अपने आत्मगौरव का बोध कराने और इतिहास के प्रति जागरूक करने का प्रयास किया गया, किन्तु वे यह भूल गए कि इतिहास के प्रति उत्तरदायित्व होना चाहिए। इसी कारण संविधान की प्रस्तावना में समाजवाद और सेकुलरिज़्म शब्द सम्मिलित किए गए। हमारे संविधान में सभी को समान अवसर और समानता की बात की जाती है, फिर भी संविधान जाति, भाषा और क्षेत्र के आधार पर विभेद करता है। हिंदुओं के पर्सनल मामलों के लिए सामान्य विधि है, जबकि मुसलमानों के लिए आज भी 1937 का शरीयत अधिनियम लागू है।

जाति, भाषा और क्षेत्र के नाम पर समाज को विभाजित करने की साजिश की गई। आब्रहमिक शक्तियाँ हमेशा इस भय में रहता हैं जिस दिन हिंदू समाज अपने स्वधर्म का पालन करने लगेगा तो हिंदू समाज को रोकना असंभव होगा। इसी कारण पिछले 80-85 वर्षों में हिंदू समाज को संवैधानिक स्तर पर प्रताड़ित किया गया। उन लोगों का महिमामंडन किया गया जिन्होंने भारत को लूटा और उसके टुकड़े किए। जिन्होंने भारत की राष्ट्रधर्म, परिवार व्यवस्था और संस्कृति को ध्वस्त करने का प्रयास किया, उनका सम्मान किया गया। इससे अधिक दुखद क्या हो सकता है? हमें इन पहलुओं को ध्यान में रखते हुए यह समझना होगा कि गणतंत्र दिवस का वास्तविक महत्व उस दिन स्थापित होगा, जब भारत का स्व सनातन धर्म पुनः स्थापित होगी।

गणतंत्र दिवस के इस पावन अवसर पर हमें एक महत्वपूर्ण संकल्प लेना चाहिए कि हम ऐसा संविधान निर्मित करेंगे, जो न केवल भारतीय लोकतंत्र की नींव को सुदृढ़ करेगा, अपितु भारत के स्व सनातन धर्म के शाश्वत सिद्धांतों को भी आत्मसात करेगा। यह संविधान हमारी संस्कृति, हमारे मूल्य और हमारे इतिहास की रक्षा करेगा, जिससे भारत को वैश्विक पटल पर अपनी विशिष्ट पहचान प्राप्त हो सके।

हमारी राजसत्ता, न्यायपालिका और कार्यपालिका, इन तीनों प्रमुख अंगों को उसी सनातन धर्म के सिद्धांतों का पालन करते हुए, राष्ट्र को परम वैभव और शक्ति के शिखर तक पहुंचाने का कार्य करना चाहिए। यही वह मार्ग है, जो हमें एक सशक्त, समृद्ध और एकजुट समाज की ओर अग्रसर करेगा।

गणतंत्र दिवस तभी सार्थक रूपेण मनाया जा सकेगा, जब भारत के स्व सनातन धर्म के मूल्यों की पुनः प्रतिष्ठा होगी। यही वह काल होगा जब हम अपने संविधान को उस आदर्श रूप में देखेंगे, जो हमारे राष्ट्र की आत्मा सनातन धर्म और संस्कृति का संरक्षण करेगा, और विश्व गगन में भारत माता की जयजयकार होगी।


✍️दीपक कुमार द्विवेदी

टिप्पणियाँ