पानीपत के बलिदानी नजीबाबाद युद्ध कैसे पलटा



"रावसाहब, आपको भी याद रखना चाहिए कि मराठी राजसत्ता की चाकरी करते-करते मैं बूढ़ा हो गया हूँ। आपके मन में कोई वहम हो, तो वाई के महागणपति की सौगन्ध उठाकर कहता हूँ-चार दिन के अन्दर-ही-अन्दर नदी में कहाँ पर ढलान है, खोज दूँगा और नदी पारवाले नजीबाबाद को मराठी सेना भिड़ाकर ही दम लूँगा। नावों का पुल उड़ा देते समय राज्य की सेवा में तोप के गोलों ने मुझे लील लिया तो गंगा तट पर वीरगति को प्राप्त हो जाऊँगा।"

नजीब इस चीज से बिल्कुल अनजान था बल्कि उसका महत्वकांशी मन आसमान को छू रहा था जबसे उसे अफगानिस्तानी सेनापति जहांंखान के पत्र से दुराणी के हिंदुस्तान दस्तक देने का संदेशा मिला था ।

गोविन्दपन्त की प्रतिज्ञा सच्चाई में बदल रही थी। पन्त ने कई वर्ष तक पासवाले इलाके में ही मामलतदारी की थी। साथ में वे जैत्या गूजर को भी ले आये थे। जैत्या को इस इलाके के नदी-नालों, उतार-चढ़ावों तथा टीलों-गढ़ों की चप्पा-चप्पा जानकारी थी।

जैत्या गूजर को साथ लेकर मराठा सेना रात में प्रवास करते हुए दो दिन में हरिद्वार पहुँच गयी। हरिद्वार की ऊपरी तरफ जैत्या ने नदी में कम पानीवाला स्थान बता दिया। कम पानी का यकीन होते ही मराठा सेना हर्ष से पागल हो उठी।

आधी रात बीत चुकी थी। रात में ही सबको गंगा पार जाना था। गंगापार गश्त लगाते पहरेदार सतर्क थे उनकी पैनी नजरों में से बचकर चुपचाप आगे को बढ़ते हुए नजीब पर अचानक धावा बोलना था। जिवाजी भोइटे और अन्ताजी माणकेश्वर का पुत्र तात्या के साथ आठ हजार मराठे अपने घोड़ों समेत नदी पार हो लिये। किनारे पर खड़े दत्ताजी के हाथ का सहारा लेकर गोविन्दपन्त भी पानी से बाहर आकर किनारे पर चढ़ गये। दत्ताजी चाहते थे जनकोजीबाबा जी भी उनके साथ चले किन्तु गोविंदपन्त ने नकारते हुए नजीबाबाद की मुहिम उनपर ही सौंप दी जाने की मांग की ।

दिन निकला। मराठा सेना के घुस आने की बात अब सर्वविदित हो गयी। नजीब की स्थान-स्थान पर लेगी चौकियाँ मराठी सेना का विरोध एवं प्रतिकार करने लगीं। मराठों ने तलवारें खींच लीं। दोनों ओर से शस्त्रास्त्रों की आग बरसने लगी। नजीब का मुल्क उजड़ने लगा। हर गाँव के परकोटे के परखचे ओखली तोपों की मार से उड़ने लगे, ढह ढहकर गिरने लगे। अनेक दीवारों में बड़े-बड़े छेद हो गये। लपलपाती आग में घरों की बल्लियाँ और खम्भे काड-काड-काड बजने लगे।

देखते-ही-देखते में गोविन्दपन्त ने नजीबाबाद को घेर लिया। किले की मोर्चाबन्दी बहुत मजबूत थी। मराठों ने खाइयाँ खोदकर सुरंगें बिछायीं। नजीब का किलेदार प्राणों की बाजी लगाकर किला लड़ा रहा था। दो दिन तक लड़ाई जारी थी। इसमें मराठों ने शत्रु का एक हाथी, तीरों की पाँच गाड़ियाँ, जंजालावाले कुछ ऊँट और कुछ घोड़े जीत लिये। नजीब का पूरा काफिला किले में घिरा पड़ा था। नजीब की बेगम थरथर काँप रही थी। मराठे चाहते तो नजीब की बेगम को बन्धकं बना सकते थे। किन्तु अपने विरद के विरुद्ध वे वेगम को छूना तक नहीं चाह रहे थे।

अब्दाली बादशाह तो अभी सैकड़ों मील पर था क्योंकि अफगानिस्तान में एक तरफ से नासिरखान ने और दूसरी तरफ से द्वारेश हिराती ने बगावत कर रखी थी जिसके चलते हिंदुस्तान आने में देरी हो रही थी ।

गोविन्दपन्त के कदम गंगापार पड़ते ही नजीब हताश-सा हो गया। उसने तुरन्त एक ऊँटसवार को अयोध्या भेजा। सन्देशा भिजवाया, "हे, अयोध्यानिवासी आला, पापियों के भूतों ने अन्तर्वेद में हैदोस मचाया है। उनकी आँख का काँटा नजीब खत्म हो गया कि अगली बारी तुम्हारी ही है। इन पापियों के हाथों मरने की ही तुम्हारी मंशा हो, तो मरो अपनी बला से। किन्तु एक बात गाँठ बाँध लो, अब भी तुम चाहो तो इस्लाम को बचा सकते हो। शिया या सुन्नी, आखिर हैं तो इस्लाम की दो बाँहें ना?"

यह मालूम पड़ते ही कि दस हजार मराठा घुड़सवारों ने नजीबाबाद में हैदोस मचा रखा है और अपनी बेटी किले में फँसी हुई है, दुन्देखान और उसके साथ हफीज रहमतखान लड़ाई में कूद पड़े। नजीब के सभी दोषों को भुलाकर वे अफगानों के लिए लड़ने लगे। दिन-भर तो दुन्देखान और रहमतखान ने अच्छी टक्कर दी। किन्तु मराठों के भीम प्रहार के सामने वे ढीले पड़ गये। आहिस्ता आहिस्ता पीछे हटने लगे। मराठे पूर्वी किनारे से शुक्रताल के पुल की ओर लपकने लगे। नजीब की सारी आशाएँ समाप्त हो गयीं। फिर भी यह ठानकर कि मराठों को पुल की ओर बढ़ने नहीं देना है, क्योंकि वे बढ़े तो नदी पार बनाया शस्त्रागार और सैनिकी सामान-असबाब बेकार हो जाएगा, नजीब बहुत डटकर मुकाबला करने लगा। घमासान में दुन्देखान को शिकस्त खाते देखकर नजीब हिम्मत हार गया। डर के मारे थरथर काँपते अपने दो हजार सैनिकों को लेकर जान बचाने के लिए वह पूर्व की ओर पहाड़ों का सहारा लेने के लिए भागने लगा।

प्रतिकार लगना समाप्त हुआ-सा जानकर मराठे पुल की ओर लपके। इसी पुल ने आज तक उनके लिए भारी सिरदर्द पैदा कर रखा था। पुल दिखाई देते ही मराठों ने भारी शोर मचाया। किसी ने पुल पर जमी माटी उकेरना शुरू किया तो किसी ने नीचे की नावों में लगी रस्सियाँ काटना प्रारम्भ किया। कुछ और लोग पुल की लकड़ी को नजीब मानकर उस पर अपने तलवार परशु से जोर-जोर से वार करने लगे।

डर का मारा नजीब जान बचाने के लिए पहाड़ों की ओर दौड़ा जा रहा था। कोई कोस-भर जी तोड़ रपट पूरी हो ही रही थी कि सामने से धूल के बादल उठते दिखाई दिये। वह तो अपना खात्मा तय समझ चुका था तभी सामने से आती सेना के हरे झण्डे देख हर्ष से पागल ही हो गया। किसी बारात के सामने नाचनेवाले छोकरों के समान नाचने लगा। अयोध्या से उमारावगिरी और अनूपगिरी नामक दो बैरागियों की सेना नजीब की सहायतार्थ आयी थी। दोनों बैरागी भाई थे। सुजाउद्दौला की सेना में कुछ कट्टर हिन्दू बैरागी भी थे। पर्वत-प्राय देह, जबरदस्त हिम्मत और लड़ने में काँटा थे सेना के सारे बैरागी। आसानी से किसी से हारनेवाले भी नहीं थे। दस हजार की वह ताजा कुमक देखकर नजीब की सारी थकावट भाग गयी। 

केंचुली डाल चुके साँप की भाँति उसने नयी कान्ति धारण कर नजीब ने फुफकारना शुरू कर दिया था। अपने साथियों द्वारा नजीब ने अफवाह भी उड़ा दी कि अब्दाली भी आ पहुँचा है। सुनकर सभी सैनिक नारे लगाने लगे- 'अब्दाली आयाऽऽ' 'दुराणी, आयाऽऽऽ।' इस चीखने-चिल्लाने का शोर बढ़ता ही गया।

मराठों ने ऊपर की माटी उकेर फेंकते हुए अभी दो-चार नावों की रस्सियाँ काटी ही थीं कि किनारे पर स्थित झाड़ी, झुरमुट में जबरदस्त हलचल दिखाई दी। साथ ही घोड़ों की टापों और नारों-घोषणाओं का शोर भी सुनाई दिया। 'दुराणी आयाऽऽऽ', 'अब्दाली आयाऽऽऽ।' शोर सुनकर मराठों के सेना में सेपहले दस-पन्द्रह भाग खड़े हुए। उनकी देखादेखी बाकी भी भागने लगे। प्रत्यक्ष दुराणी की विशाल सेना के आने की खबर सुनकर सबके छक्के छूट गये। कोई धीरज रखनेवाला नहीं था। कोई धीरज दिलानेवाला भी नहीं था। जिधर देखो उधर रक्त की नदियाँ बहती दिखाई देने लगीं। 

शाम ढलते अगाड़ी के मराठा सैनिक नजीबाबाद में पहुँच गये। वहाँ पाँच-छह हजार मराठा सैनिक पड़ाव डाले हुए थे। गंगा की तरफ से भागते आकर जब ये सैनिक आगे निकल गये तो पड़ाववाले सैनिक भी भागने लग गये। उमरावगिरी और नजीब की सेनाएँ पीछा बराबर करती ही चली आ रही थीं। अँधेरे में मराठा सैनिक जान हथेली पर लेकर भाग रहे थे और उनके प्राण लेने के लिए वैरागी दैत्य उनका पीछा करते आ रहे थे। रात के अँधेरे में कई जगहों पर ठोकरें खाते हुए मराठे जैसे-तैसे हरिद्वार की ऊपर की ओर आ गये। लेकिन अँधेरे में वह ढलान नहीं दिखाई दे रही थी, जिसे लांघकर वे पहले इधर को आ गये थे। अनुमान से पानी में कूदे-कई घोड़े गंगार्पण हो गये। गलत स्थान पर प्रवाह में कूदे मराठे डूबने-उतराने लगे। कई डूब गये, कई बह गये। विशाल गंगा में आदमी और जानवर कूड़े-कचरे की भाँति बहकर जाने लगे। इनमें से जिन्होंने सही ढलान पकड़कर जान बचाई थी, उन पर वैरागियों के तीर बरसने लगे। भालों की भाँति तीर शरीर में चुभोये जाने लगे। 'मर गया', 'मर गया', 'हे माताऽऽ', 'हे जगदम्बेड' की करुण चीखें अँधेरे को चीरने लगीं। उन चीत्कारों से अँधेरा भी काँप उठा। ढलान के सहारे आगे बढ़नेवाले पर इस पर खड़ा नजीब अपने तीरन्दाजों से तीरो की वर्षा कर रहा था और एक के बाद एक वीर गंगा तट पर ही वीरगति को प्राप्त हो गए ।

नजीब चीखता रहा, चिल्ला-चिल्लाकर हुक्म देता रहा, विकट अट्टहास करता रहा किन्तु नजीबाबाद को जिस प्रकार उसने उजड़ता देखा था वो खौफ मराठों ने उसके भीतर इस प्रकार भरा था कि वो जानता था कि ये मराठा फिर उठेंगे, फिर आएंगे और फिर से जरी पटका लहराएंगे ।

क्रमश:
#पानीपत_युद्ध

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