मानवीय मूल्यों के उत्थान का आधार सनातन धर्म



हम लोग वैचारिक विषयों पर बहुत चिंतन-मंथन करते हैं, लेकिन यह एक महत्वपूर्ण विषय भूल जाते हैं कि सनातन धर्म के उत्थान और मानवीय मूल्यों की पुनः स्थापना का आधार क्या हो सकता है? यदि हम आज की वर्तमान परिस्थितियों का अध्ययन करें, तो हम पाएंगे कि श्रेष्ठ मूल्यों और चिंतन परंपरा का आधार स्तंभ सनातन धर्म और उसके प्रमुख सिद्धांत हैं। सनातन धर्म के उत्थान से तात्पर्य यह है कि मानवीय मूल्यों की पुनः स्थापना हो सके और मानवता का कल्याण संभव हो सके। इस विषय पर हमें यह चिंतन अवश्य करना चाहिए कि वर्तमान में उपभोक्तावाद और भौतिकतावाद के युग में, जहां मानवता और मानवीय मूल्यों का क्षरण हो रहा है, हमें क्या करना चाहिए। आज हर कोई अधिकार चाहता है, लेकिन कर्तव्य कोई नहीं निभाना चाहता। भाई-भाई का गला काट रहा है, बहन-भाभी के रिश्तों को कलंकित किया जा रहा है। पूरी मानवता त्राहि-त्राहि कर रही है। हर जगह प्रकृति का दोहन हो रहा है, धरती का तापमान बढ़ रहा है, और हर तरह से पूरी मानव सभ्यता बहुत बड़े खतरे की ओर बढ़ रही है। आसुरी शक्तियां बहुत तेजी से बढ़ रही हैं। लोग भौतिकतावाद में इतने डूब चुके हैं कि उन्हें सही और गलत का भान भी नहीं हो रहा है। इन परिस्थितियों में समाधान सिर्फ सनातनी मूल्यों और सिद्धांतों के आधार पर संभव है।

परिवार व्यवस्था: मानव सभ्यता के उत्थान का आधार

आज के समय में भौतिकतावाद और बाजारवाद के कारण दुनिया भर में परिवार व्यवस्था पूरी तरह से ध्वस्त होती जा रही है। संयुक्त परिवार व्यवस्था बहुत कम बची है। वर्तमान में परिवार व्यवस्था के ध्वस्त होने का मुख्य कारण भौतिकवाद और बाजारवाद हैं, जिनके कारण परिवार व्यवस्था और पारिवारिक मूल्य पूरी तरह से नष्ट हो चुके हैं। इस परिस्थिति में, सनातनी परिवार व्यवस्था, जिसमें पूरी मानव सभ्यता को अपने कंधों पर उठाने की क्षमता है, आज के समय में सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत है। यदि हम सनातनी परिवार व्यवस्था के सिद्धांतों को अपनाएं, तो मानव सभ्यता का उत्थान संभव है। मानवता को भविष्य में आने वाले संकटों से बचाया जा सकता है। इसलिए, परिवार व्यवस्था और पारिवारिक मूल्यों का उत्थान ही सनातन धर्म का उत्थान है।

धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष का सिद्धांत और मानव मात्र के कल्याण का मार्ग

धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की बात करते हुए, आज की दुनिया काम और क्रोध के मायाजाल में फंसी हुई है और पूरी तरह अंधकार की ओर जा रही है। ऐसी दुनिया में, सनातनी परंपरा के महान ऋषियों के त्याग और तपस्या का स्वरूप धर्म के चार पुरुषार्थों के सिद्धांत में छिपा हुआ है, जिसमें पूरी मानवता के कल्याण का मार्ग है। जैसे बुद्धि का संबंध धर्म से है, वैसे ही शरीर का संबंध अर्थ से, काम का संबंध मन से और आत्मा का संबंध मोक्ष से है। यही धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के सिद्धांत में मनुष्य की सभी लौकिक और परलौकिक कामनाओं का समावेश हो जाता है। मानवीय सभ्यता और मानवीय मूल्यों के उत्थान से मानवता का कल्याण संभव है, और यह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के सिद्धांतों में निहित है।

सृष्टि की व्यवस्था: आधिदैविक, अधिभौतिक, आध्यात्मिक स्वरूप

सृष्टि के स्वरूप को समझे बिना मानवीय सभ्यता और मानवीय मूल्यों के सिद्धांतों को समझना कठिन है। इस सृष्टि में जो कुछ घटित होता है, उसके आधिदैविक, अधिभौतिक और आध्यात्मिक कारण होते हैं। जैसे नदी का भौतिक स्वरूप होता है, लेकिन नदी का पानी बारिश और ग्लेशियर से आता है, तो यह आधिदैविक स्वरूप है। नदी का पानी मीठा या खारा होना भी इसका आधिभौतिक स्वरूप है, जबकि उसे जानना और समझना आध्यात्मिक स्वरूप है। इसलिए, कोई घटना बिना कारण के नहीं होती। सृष्टि के आधिदैविक, अधिभौतिक और आध्यात्मिक स्वरूप को समझे बिना हम न पुराणों को समझ सकते हैं, न वेद मंत्रों को। इन्हें समझने के लिए सृष्टि के इन तीनों स्वरूपों को समझना आवश्यक है।

धर्म का स्वरूप और धर्म के 10 लक्षण: मानवीय मूल्यों के उत्थान के आधार स्तंभ

सनातन धर्म के सबसे बड़े स्मृति ग्रंथों में धर्म के स्वरूप और धर्म के लक्षण बताए गए हैं। धर्म शब्द संस्कृत की 'धृ' धातु से बना है, जिसका अर्थ है धारण करना, पालन करना। धर्म का अर्थ है वह आचरण, जो प्राणिमात्र को सद्मार्ग पर अग्रसर करे। जो हमारे जीवन में अनुशासन लाए, वह धर्म है। मनुस्मृति के अनुसार धर्म के दस लक्षण इस प्रकार हैं:

धृतिः क्षमा दमोस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्॥

धैर्य, क्षमा, संयम, अस्तेय, पवित्रता, इन्द्रिय निग्रह, बुद्धि, विद्या, सत्य और क्रोध न करना - ये धर्म के दस लक्षण हैं। यदि मानवता इन दस लक्षणों का पालन करने लगे, तो इस भौतिकवाद के युग में भी धर्म का स्वरूप और सिद्धांत मानवता को सही दिशा दिखाते हैं। इसलिए धर्म का स्वरूप और उसके दस लक्षण मानवीय मूल्यों के आधार स्तंभ हैं।

वर्तमान व्यवस्था एवं सनातनी व्यवस्था: मानवता के उत्थान का मार्ग

वर्तमान व्यवस्था पर विचार करते हुए हमने गहन चिंतन और मंथन किया है। कुछ ऐसे बिंदु हैं जिन पर चर्चा करना कई लोगों को कड़वा लग सकता है, लेकिन सत्य सदैव कड़वा होता है। आज भौतिकवाद और बाजारवाद के प्रभाव के कारण भारत समेत पूरे विश्व में मानवीय मूल्यों और धर्म के सिद्धांतों का लगातार ह्रास हो रहा है। इस पतन की शुरुआत महाभारत के युद्ध के पश्चात् कलियुग के आरंभ से ही हो गई थी। धीरे-धीरे परिस्थितियां ऐसी बनती गईं कि धर्म का मूल स्वरूप और उसके सिद्धांत विलुप्त होने लगे।

धर्म के क्षय के कारण भारतवर्ष, जो कभी विश्वगुरु था और पूरी दुनिया को दिशा दिखाता था, धीरे-धीरे सिकुड़ने लगा। आज स्थिति यह है कि भारत का वह स्वर्णिम अतीत धुंधला हो चुका है। कभी भारत का चक्रवर्ती सम्राट सम्पूर्ण विश्व में शासन करता था, लेकिन आज हिंदू नौ राज्यों में अल्पसंख्यक हो चुका है। जब सनातन वैदिक धर्म का ह्रास होता है, तो उसके साथ ही मानवीय मूल्यों और धर्म का भी पतन होता है। इसके परिणामस्वरूप मानवता पर गहरा संकट उत्पन्न हो गया है।

इस संकट से उबरने का एकमात्र मार्ग यह है कि वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था का विकल्प खोजा जाए। मैंने गहन चिंतन-मनन के बाद यह निष्कर्ष निकाला है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था से श्रेष्ठ व्यवस्था "सनातनी राजा" के चुनाव की प्रणाली हो सकती है।

सनातनी शासन व्यवस्था का स्वरूप

1. राजा का चुनाव कठोर परीक्षाओं के माध्यम से किया जाए। इसमें साधु-संत, समाज के विचारक और प्रबुद्ध वर्ग की भूमिका हो।

2. राजा के अधीन प्रधानमंत्री हो, जिसका चुनाव जनता करे। प्रधानमंत्री के पास संपूर्ण प्रशासनिक शक्तियां हों।

3. ग्राम स्तर से राष्ट्रीय स्तर तक जनप्रतिनिधियों का चुनाव हो।

4. यदि प्रधानमंत्री धर्म के अनुकूल न चले, तो राजा उसे हटा सके।

5. यदि राजा निरंकुश हो जाए, तो प्रधानमंत्री, ग्राम मुखिया और जनप्रतिनिधि मिलकर राजा को हटाने का प्रस्ताव ला सकें।

6. राजा का पद स्थायी हो, लेकिन उत्तराधिकारी का चयन राजा स्वयं करे। राजा को अपने परिवार से किसी को उत्तराधिकारी चुनने का अधिकार न हो।

सनातन धर्म और मानवता का उत्थान

धर्म के उत्थान से ही मानवता का उत्थान संभव है। यह सृष्टि त्रिगुणात्मक है—सत्त्व, रजस और तमस गुणों से संचालित होती है। जिस गुण की प्रधानता होती है, सृष्टि वैसी ही दिशा में चलती है।

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं:
"चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः।
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्।"

(गुणों और कर्मों के आधार पर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के चार वर्णों की रचना मैंने की है।)

इस त्रिगुणात्मक सृष्टि को समझने के लिए हमें अधिभौतिक आधिदैविक आध्यात्मिक दृष्टिकोण को अपनाना चाहिए। जब हम इन सिद्धांतों को समझकर उनका पालन करेंगे और धर्म का आलंबन करते हुए स्वधर्म का बोध करेंगे, तभी सनातन धर्म का उत्थान संभव होगा।

सनातन धर्म सार्वभौमिक, शाश्वत और कालातीत है। इसका उत्थान ही मानवीय मूल्यों का उत्थान है। जब धर्म अपने मूल स्वरूप में स्थापित होगा, तब मानवता पुनः उन्नति के पथ पर अग्रसर होगी।

✍️ दीपक कुमार द्विवेदी

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