धर्म के आधार पर बहुत से संगठन बनते हैं, लेकिन एक सीमा के बाद समाप्त हो जाते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण यह होता है कि हर व्यक्ति अपनी छवि चमकाने और श्रेय लेने की प्रवृत्ति के कारण संगठन के उद्देश्यों से भटक जाता है। यही कारण है कि बड़े से बड़े संगठन समाप्त हो जाते हैं। कुछ संगठन व्यक्तिवादी भी हो जाते हैं। उदाहरण के लिए, आर्य समाज, जो कभी बहुत बड़ा संगठन था, पंजाब, आज के पाकिस्तान और हरियाणा में इसका अत्यधिक प्रभाव था। परंतु आज आर्य समाज का कोई नाम नहीं लेता। यही स्थिति हिंदू महासभा की भी हुई। हिंदू महासभा एक समय बहुत बड़ा संगठन था, लेकिन गांधीजी की हत्या में इसका नाम आने के कारण प्रशासनिक दबाव बढ़ा, और अंततः हिंदू महासभा भी विखर गया।
अभी से लगभग एक से डेढ़ वर्ष पहले "एकम सनातन भारत" नामक एक राजनीतिक दल बना था। उस समय यह काफी चर्चा में था, लेकिन आज इसके संस्थापक अंकित शर्मा भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए हैं, और "एकम सनातन भारत" भी समाप्त हो गया। इस तरह के सैकड़ों संगठन बने और समाप्त हो गए। इनका सबसे बड़ा कारण रहा—एक सीमा तक अतिवादी होना, व्यक्तिगत अहम और स्वार्थों का टकराव।
संगठन बनाते समय और संगठन पर काम करते हुए यह भाव स्पष्ट रखना चाहिए कि जो काम हम कर रहे हैं, वह हमारे हित या नाम के लिए नहीं, बल्कि समाज के हित में है। मैंने श्रद्धेय दत्तोपंत ठेंगड़ी जी की पुस्तक "कार्यकर्ता" में एक बात पढ़ी थी। उसमें लिखा है कि एक बहुत बड़ा कार्यक्रम हुआ था, जिसमें संघ के स्वयंसेवक अत्यधिक प्रसन्न थे और उस कार्यक्रम की सफलता के हैंगओवर से बाहर नहीं निकल पा रहे थे। इस पर दत्तोपंत ठेंगड़ी जी ने लिखा कि कार्यकर्ता के अंदर यह भाव कभी नहीं आना चाहिए कि "हमने" यह किया है और इसका श्रेय "मुझे" लेना है। हमें यह समझना चाहिए कि यह सब समाज कर रहा है और हम केवल एक माध्यम मात्र हैं।
जैसे हमारे धर्मग्रंथों में कहा गया है कि करने वाले भगवान हैं, हम केवल निमित्त मात्र हैं। हमें हर कार्य को निष्काम भाव से करना चाहिए, जिसमें फल की इच्छा न हो। बड़े-बड़े संगठनों के बिखरने का सबसे बड़ा कारण हितों का टकराव, व्यक्तिवाद और वैचारिक अतिवाद रहा है। उदाहरण के लिए, दयानंद सरस्वती जी ने जो कहा, वही अंतिम बात मान ली गई और उसी को डिफेंड करने की प्रवृत्ति ने बड़े संगठनों और समूहों को कमजोर कर दिया। यहां तक कि हितों के टकराव से बड़ी आचार्य पीठें तक नहीं बच पाईं, तो संगठनों की बात ही छोड़ दीजिए।
पिछले हजार वर्षों में और आधुनिक समय में देखें तो तीन सौ वर्षों में जितने संगठन बने, उनमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अलावा कोई भी संगठन सफल नहीं हुआ। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि संघ कभी व्यक्तिवादी नहीं रहा। दूसरा कारण यह है कि संघ में संप्रदायिक वृत्ति नहीं है। संघ में आर्य समाजी आ सकता है, पौराणिक दर्शन का अनुयायी आ सकता है, शैव और वैष्णव दोनों जुड़ सकते हैं। संघ में हर जाति, पंथ, क्षेत्र और भाषा के लोग जुड़ सकते हैं, और उनके साथ कोई भेदभाव नहीं होता।
यहां तक कि जो व्यक्ति संघ की शाखा में नियमित जाता है, वह 24x7 राष्ट्र और समाज के लिए सोचता रहता है। चाहे सर्दी हो, गर्मी हो या बरसात, संघ का स्वयंसेवक निस्वार्थ भाव से कार्य करता है।
(संघ के स्वयंसेवक का मूल मंत्र यही है
चरैवेति चरैवेति यही तो मंत्र है अपना
नहीं रूकना, नहीं थकना, सतत चलना सतत चलना
यही तो मंत्र है अपना शुभंकर मंत्र है अपना।।
हमारी प्रेरणा भास्कर है जिनका रथ सतत चलता
युगों से कार्यरत है जो सनातन है प्रबल ऊर्जा
गति मेरा धरम है जो भ्रमण करना भ्रमण करना ।।
यही तो मंत्र है अपना शुभंकर मंत्र है अपना…
हमारी प्रेरणा माधव है जिनके मार्ग पर चलना
सभी हिन्दु सहोदर है ये जन-जन को सभी कहना
स्मरण उनका करेंगे हम समय दे अधिक जीवन का।।
यही तो मंत्र है अपना शुभंकर मंत्र है अपना…
हमारी प्रेरणा भारत है भूमि की करे पूजा
सुजल सुफला सदा स्नेहा यही तो रूप है उनका
जिये माता के कारण हम करे जीवन सफल अपना।।
यही तो मंत्र है अपना शुभंकर मंत्र है अपना…
इस मंत्र को गुनगुनाते हुए संघ स्वयंसेवक कार्य करता रहता है। उसके मन में किसी प्रकार का अतिवाद या संप्रदायिक वृत्ति नहीं आती। उसका एकमात्र ध्येय भारत माता को परम वैभव शिखर तक पहुंचाना है। )
एक और अद्भुत बात यह है कि संघ की शाखा में किसी प्रकार का कर्मकांड, पूजा-पाठ या अनुष्ठान नहीं होता। शाखा में केवल शारीरिक खेल, बौद्धिक चर्चा और कार्यक्रम होते हैं। जिसके कारण है कि संघ का स्वयंसेवक धर्मनिष्ठ और ध्येय निष्ठ होता है। संघ अपने को कभी धार्मिक संगठन के रूप में प्रस्तुत नहीं करता, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक संगठन के रूप में प्रस्तुत करता है। संघ का मुख्य कार्य व्यक्ति निर्माण है।
संघ कुछ नहीं करता, बल्कि स्वयंसेवक कुछ भी नहीं छोड़ता। इसी कारण संघ ने हिंदू समाज के सभी मत-पंथ और विचारधाराओं को हिंदुत्व और भारत माता को परम वैभव शिखर तक ले जाने के एकमात्र ध्येय पर संगठित करने में सफलता पाई है।
हालांकि हमें यह समझना होगा कि हजार-बारह सौ वर्षों की समस्याएं सौ वर्षों में समाप्त नहीं हो सकतीं। समाज का अनुशासन और लक्ष्य आधारित परिवर्तन एक धीमी प्रक्रिया है। किसी समाज को 180 डिग्री पलटने में सैकड़ों वर्ष लगते हैं।
उदाहरण के लिए, अखंड भारत का संकल्प। इसे पूर्ण करने में कई सौ वर्ष लग सकते हैं। कई पीढ़ियां इस कार्य में खप जाएंगी। इसी प्रकार हिंदू राष्ट्र के स्वप्न को साकार करने के लिए भी समाज को बहुत कुछ खोना पड़ेगा। करोड़ों लोगों का बलिदान देना पड़ेगा। तब जाकर हमें हिंदू राष्ट्र मिलेगा।
हमें यह समझना चाहिए कि हिंदू राष्ट्र या अखंड भारत कोई इंस्टेंट नूडल्स नहीं है, जो दो मिनट में बनकर तैयार हो जाए। यह धैर्य, त्याग और बलिदान से ही संभव है। हमें विचलित नहीं होना चाहिए। हमें लक्ष्य आधारित और बलिदान हेतु तैयार रहना चाहिए। हमें हजार से बारह सौ वर्षों की दीर्घकालीन योजना बनाकर कार्य करना होगा। तभी इस कलियुग में धर्म की स्थापना संभव हो सकेगी। हमें अत्यधिक उत्साह में आकर कोई भी त्रुटि नहीं करनी चाहिए। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि हिंदू समाज अपने स्तर पर प्रयास न करे या संगठन न बनाए। हिंदू समाज को अपने स्तर पर संगठन खड़े करने चाहिए, प्रयास करना चाहिए। मुझे इसमें कोई आपत्ति नहीं है कि हिंदू समाज अपने स्तर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे सैकड़ों संगठन खड़े करे। मोहल्ला स्तर, गांव स्तर पर छोटे-छोटे समूह बनाएं, छोटी-छोटी टोलियां तैयार करें और अपने स्तर पर कार्य करें। लेकिन यह सब निष्काम भाव से और स्पष्ट लक्ष्य के आधार पर होना चाहिए। तभी हम अपने उद्देश्यों को प्राप्त कर सकेंगे और सफल हो पाएंगे।
दीपक कुमार द्विवेदी
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