पानीपत के बलिदानी कुंजपुरा युद्ध (दत्ता जी का बदला


कुंजपुरा का नवाब नजाबत खा की मदद के लिए नजीब का गुरु कुतुबशाह, सरहिंद के सूबेदार अब्दुल समद खान और मोमिन खान कुंजपुरा पहुंच चुके थे । इन सबको मराठी सेना के कूच की सूचना मिल चुकी थी और नजाबत खान घबराया हुआ था । अब दूर से आने वाली आवाज सुनकर वो तुरंत कुतुबशाह के डेरे में पहुंचा और बोला कि मावले करनाल के रास्ते आ रहे है ।

कुतुबशाह मस्ती में खड़ा होकर बोला "किलेदार जी, आपने मेरी ये फौलाद सी बाजू देखी है ? इन्हीं हाथों से मैने बुराड़ी घाट पर उनके शेर दत्ता जी शिंदे को मारा था" आप बेफ्रिक रहिए ...

शाह साहेब, इस बार सिर्फ सरदार नहीं पेशवा भाऊ साहेब स्वयं आ रहे है नेतृत्व करते हुए - नजाबत खान ने बताया

कुतुबशाह ने हंसते हुए कह तो दिया कि देख लेंगे कि कितने शेर आते है ? पर पेशवा के स्वयं आने का सुनकर डर उसके अंदर तक बैठ गया था । उसे ये बात अच्छे से मालूम थी कि अगर पेशवाओं की उपस्थिति हो तो मराठे सैनिक पागल होकर लड़ते है । अब्दाली को भी खबर लग गई थी तो उसने 10000 अफगानी सैनिकों की फौज कुंजपुरा की मदद के लिए भेज दी थी । 

दोपहर में जैसे ही मराठी सेना ने कुंजपुरा में कदम रखा, जानकोजी शिंदे के तनबदन में आग लग गई । उसकी नजरें सिर्फ कुतुबशाह को ढूंढ रही थी ताकि बुराड़ी में दत्ता जी की देह पर नाचने वाले को सही अंजाम तक पहुंचाया जा सके । मल्हारराव होलकर, विट्ठल शिवदेव, और दमा जी गायकवाड़ भी कुंजपुरा को अपनी तलवार से सींचने को आतुर थे । 

कुतुबशाह के ठीक सामने कृष्णा राव (शमशेर बहादुर) और दमा जी के सेना खड़ी हो चुकी थी । करनाल के पीछे से ही भाऊ साहेब और इब्राहिम गार्दी के दस्ते आकर सेना से मिल चुके थे । शमशेर आते वक्त सभी छोटे बड़े घाटों की रक्षा हेतु सैनिक तैनात कर आए थे । जैसे ही भाऊ ने दमा जी को कहा कि आज रात कुंजपुरा को गिरा देंगे तो युद्ध तुरंत शुरू कर दिया गया ।

कुंजपुरा किला रक्षा की दृष्टि से मजबूत स्थिति में था पर गार्दी के तोपखाने और मावलों के जोश के सामने कहा टिकने वाला था । और ये पठानों को बहुत जल्दी ही समझ आ गया । नजाबत, अब्दुल समद, मोमिन और कुतुबशाह सबकी टुकड़ियों में भगदड़ मच गई ।

कुतुबशाह को दमा जी और शमशेर जिंदा पकड़ लाए ताकि भाऊ साहेब को दिखाया जा सके कि जहरीले नाग कैसे होते है । भाऊ साहेब उसे होदे में बैठे देखकर चिढ़ गए और चिल्लाए कि इस नीच को किसने ऊपर बैठाया? नीचे खींचो इसे । तलवार हाथ में लेकर लेकर वो कुतुबशाह को बोले " बता गिलचे, मेरे दत्ता जी को किसने मारा था" ?

कुतुबशाह को पता था कि वो किसी भी कीमत में नहीं बचने वाला, इसीलिए वो हिम्मत से बोला "मैने ही मारा था, मैने अपने जिहाद के काम को पूरा किया था । युद्ध में अगर गनीम हाथ आ जाता है तो उसका सिर काटकर, भाले की नोक पर उसे घुमाना हमारे यहां दस्तूर है" । ये सुनते ही भाऊ साहेब पागल हो गए और सैनिकों को बोले कि देख क्या रहे हो ? बोटी बोटी नोच डालो इसकी । तलवारें उठी ही थी कि जानकोजी की दहाड़ ने सबको रोक दिया । शेर गुर्राया और बोला कि ये मेरा शिकार है भले ही दमा जी और शमशेर ने इसे पकड़ा हो ।

अपने लंबे जमताड़ा (बड़ी तलवार) से एक झटके में ही उसने कुतुबशाह का सर अलग कर दिया और फिर भाले की नोंक पर लगाकर वही किया जिसे करने का दस्तूर कुतुबशाह का मजहब कहता है । नजाबत खान और अब्दुल सम्मद भी युद्ध में मारे गए । सबसे बढ़िया काम ये हुआ कि दशहरे के उत्सव के लिए काफी धन और सबसे महत्वपूर्ण अनाज की बोरिया हाथ लग गई । बहुत दिनों बाद आज मराठी खेमे में खुशियां आई थी । और अब्दाली तक ये संदेश चला गया था कि इतना आसान नहीं है पेशवाओं की फौज को हराना क्योंकि कुंजपुरा युद्ध में 500-700 मराठों के बलिदान से 15-20 हजार अफगान खत्म हो गए थे ।

✍️निखिलेश
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संदर्भ - पानीपत by विश्वास पाटिल

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