शआज जय सनातन भारत एवं राष्ट्रीय युवा प्रोफेशनल फोरम के तत्वाधान में साप्ताहिक विमर्श मिलन के अंतर्गत संघ दर्शन की श्रृंखला के तृतीय भाग में "शाखा पद्धति को कैसे सुदृढ़ करें" विषय पर एक ओपन डिबेट आयोजित की गई। कार्यक्रम की शुरुआत महेंद्र सिंह भदौरिया जी ने की। उन्होंने विषय का आरंभ करते हुए कहा कि "संघ का अर्थ शाखा है। शाखा आधुनिक संदर्भ में गुरुकुल के समान है। इसी शाखा रूपी गुरुकुल से आदरणीय नरेंद्र मोदी जी जैसे व्यक्तित्व निकले, जो संघ के 30 वर्षों तक प्रचारक रहे। इसके अतिरिक्त राजनाथ सिंह जी, नितिन गडकरी जी और अन्य अनेक विभूतियाँ भी संघ की शाखा से प्रेरित होकर राष्ट्र निर्माण के लिए समर्पित हुईं।"
महेंद्र जी ने आगे कहा कि "संघ की शाखा व्यक्ति निर्माण का एक महायज्ञ है। मैं स्वयं इसका जीवंत उदाहरण हूँ। आज मैं जो भी सेवा कार्य कर रहा हूँ, उसमें शाखा पद्धति का अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान है। भारत सहित विश्व के 19 देशों में सेवा कार्य करने का अवसर मुझे मिला, जिसका प्रमुख कारण यह है कि मैं चार वर्ष की उम्र से नियमित रूप से शाखा में जा रहा हूं ।"
उन्होंने बताया कि वर्तमान में वह विश्व हिन्दू परिषद के कार्यों से जुड़े हुए हैं। उन्होंने शाखा की वर्तमान स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि "आज शाखाओं की संख्या में कमी हो रही है। इसके कई कारण हैं, जिनमें सबसे बड़ा कारण है लोगों के पास समय की कमी। इसके अतिरिक्त गलत नैरेटिव (दृष्टिकोण) भी प्रचारित हो रहे हैं, जिनका प्रभावी ढंग से प्रतिकार नहीं किया जा रहा है। साथ ही, कुछ हद तक संघ कार्यकर्ताओं में भी शिथिलता आई है। यही कारण है कि शाखाओं में सहभागिता घट रही है, जो एक गंभीर चिंतन का विषय है।"
इसके बाद विषय को आगे बढ़ाते हुए राजीव कुमार जी भाईसाहब ने कहा कि आज की परिस्थितियों को समझने के लिए हमें यह जानना होगा कि हम हजार वर्षों तक गुलाम रहे। अंग्रेजों ने हमारी गुरुकुल व्यवस्था को ध्वस्त कर दिया। स्वतंत्रता आंदोलन के समय कांग्रेस की नीतियां भी अंग्रेजों का अनुसरण करने वाली थीं। यह सब देखकर परम पूज्य डॉ. हेडगेवार जी ने समझ लिया था कि अंग्रेज गुरुकुल व्यवस्था को फिर से स्थापित नहीं होने देंगे।
इसी चिंतन के आधार पर उन्होंने सोचा कि हम हजार वर्षों तक गुलाम क्यों रहे। इन विषयों को समझते हुए 1925 में शाखा पद्धति की शुरुआत परम पूज्य डॉ. हेडगेवार जी ने की, जिसके कारण समाज में बड़ा परिवर्तन संभव हुआ। लेकिन समय के साथ, 2014 में संघ के विचार प्रवाह से निकली पार्टी भाजपा के सत्ता में आने के बाद शाखा पद्धति कमजोर होती गई। इसके कई कारण हैं।
कांग्रेस सरकार ने 2008 में एजुकेशन माफिया के दबाव में पांचवीं और आठवीं के बच्चों को फेल करने का सिस्टम बंद कर दिया था, जिसके कारण बीए, बीएससी, बीकॉम और बीटेक जैसी डिग्रियां नालायक बच्चों के हाथ में आने लगीं। यह सिस्टम अभी तक चल रहा था, जिसे मोदी सरकार ने पिछले महीने बंद कर दिया। वामपंथियों और एजुकेशन माफिया ने पढ़ाई को ही सबकुछ बना दिया।
आज के समय में बच्चों पर पढ़ाई का इतना दबाव है कि आठ घंटे स्कूल से आने के बाद बच्चे ट्यूशन में बैठा दिए जाते हैं। इससे उनके शारीरिक और मानसिक विकास पर असर पड़ता है। पढ़ाई का इतना बोझ डाल दिया गया है कि बच्चे अन्य गतिविधियों में भाग नहीं ले पाते। इसी कारण माता-पिता ने बच्चों को शाखा भेजना बंद कर दिया।
उन्होंने बताया कि चार वर्ष पूर्व हमारे शहर में चार शाखाएं लगती थीं, लेकिन आज केवल एक शाखा लग रही है। पहले एक शाखा में 80 लोग हुआ करते थे, पर आज संख्या कम हो रही है। इसके पीछे वैचारिक दिग्भ्रम भी एक कारण है।
इसके अलावा, जब प्रधानमंत्री आदिवासी शब्द का प्रयोग करते हैं तो यह संघ के वनवासी कल्याण आश्रम के विचारों के विपरीत है। संघ हमेशा वनवासी शब्द का प्रयोग करता रहा है, लेकिन आदिवासी शब्द के इस्तेमाल से अंग्रेजों और वामपंथियों के आर्य आक्रमण सिद्धांत को बल मिलता है।
उन्होंने बीमा क्षेत्र में 100% एफडीआई को लेकर भी आलोचना की और पूछा कि इसकी क्या आवश्यकता थी। हम हिंदुत्व, सनातन और स्वदेशी की बात करते हैं, लेकिन नीतिगत स्तर पर कांग्रेस की नीतियों को बढ़ावा देते हैं।
उन्होंने एक मित्र का उदाहरण दिया, जो लुधियाना में रहता है। उससे जब संघ के बारे में पूछा गया तो उसने कहा, "संघ वही है, जो नागपुर से प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और विधायक तय करता है।" इससे यह स्पष्ट होता है कि संघ का अत्यधिक राजनीतिकरण एक बड़ी समस्या बन गया है, जिसके कारण लोग शाखा में जाना कम कर रहे हैं।
आगे उन्होंने कहा कि हमें व्यक्ति-पूजक बनने से बचना चाहिए। सरकार की गलत नीतियों की आलोचना और सही नीतियों का समर्थन करना चाहिए। राजीव कुमार जी ने कहा कि भले ही वे मोदी जी और भाजपा की नीतियों की आलोचना करते हों, लेकिन संघ की शाखा में विद्यार्थियों की भागीदारी आवश्यक है।
उन्होंने सुझाव दिया कि संघ को सुदृढ़ बनाने के लिए शाखा पद्धति को मजबूत करना होगा। कार्यकर्ताओं को निस्वार्थ भाव से काम करना चाहिए और उनकी उपेक्षा नहीं होनी चाहिए।
अंत में उन्होंने कहा कि अगर शाखा पद्धति को पुनः सशक्त बनाया जाए, तो संघ फिर से अपनी मजबूती हासिल कर सकता है। उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि अगस्त-सितंबर में बंग्लादेश में हुई घटनाओं के विरोध में संघ का राष्ट्रव्यापी प्रदर्शन हुआ। उन्होंने पूछा, "हम किसके विरुद्ध नारे लगाएंगे?" कार्यकर्ता ने कहा, "बंग्लादेश मुर्दाबाद।" उन्होंने सुझाव दिया कि कांग्रेस सरकार होती तो ऐसे में सोनिया गांधी, राहुल गांधी और मनमोहन सिंह के खिलाफ नारे लगाए जाते।
2014 से पहले हमारे पास संगठन था। आज हमारे पास न तो संगठन है और न ही सशक्त सरकार। इन परिस्थितियों को बदलना होगा, क्योंकि संघ ही हमारी अंतिम उम्मीद है। इसे मजबूत करने के लिए शाखा पद्धति को फिर से सुदृढ़ बनाना होगा।
"इसी बात के साथ राजीव ने अपनी बात समाप्त की। मनीष जी ने आगे बढ़ते हुए अपनी बात शुरू की। उन्होंने संघ के वर्तमान स्थिति पर चिंता जताई और कहा कि संघ में संख्या की कमी एक बहुत बड़ी समस्या बनकर सामने आ रही है। इस कमी के कई कारण हैं, जिनका विश्लेषण किया जाना जरूरी है। मनीष जी के अनुसार, इस स्थिति का सबसे बड़ा कारण यह है कि हमारे संगठन के कार्यकर्ता शिथिल हो गए हैं। वे पहले जितने सक्रिय और प्रेरित नहीं रहे हैं। इसके अलावा, उन्होंने यह भी कहा कि हमें यह समझना होगा कि संघ के लिए सत्ता बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि वह सत्ता ही थी जिसके कारण हिंदू समाज को पिछले हजार वर्षों में बहुत कुछ झेलना पड़ा। मनीष जी का कहना था कि सत्ता का महत्व कभी नकारा नहीं जा सकता, और इसे बनाए रखना बहुत जरूरी है, ताकि हम अपने उद्देश्यों को पूरा कर सकें।
उन्होंने यह भी जोर दिया कि संघ को अपनी रणनीतियों में बदलाव करना होगा। जहां हमें उम्मीद नहीं होती, वहां भी संघ को खड़ा होना होगा, और इसके लिए हमें संगठन में और अधिक विकेंद्रीकरण की आवश्यकता है। संघ को स्वयंसेवकों की राय और सुझाव लेने का एक मजबूत सिस्टम बनाना होगा, ताकि हर कार्यकर्ता की आवाज सुनी जा सके और उसके विचारों का सम्मान किया जा सके।
मनीष जी ने यह भी कहा कि संघ एक ऐसा संगठन है, जो अपने कार्यकर्ताओं को न केवल शारीरिक, बल्कि मानसिक और आत्मिक रूप से भी सशक्त करता है। उन्होंने बताया कि संघ की शाखाओं में जो भी व्यक्ति जाता है, वह न केवल अपने देश के लिए कार्य करता है, बल्कि उसे जीवन में एक नया दृष्टिकोण और आत्मविश्वास मिलता है। संघ के माध्यम से वह व्यक्ति किसी भी क्षेत्र में सफलता प्राप्त कर सकता है, क्योंकि संघ में मानव संसाधन को सिखाया जाता है, जो किसी भी परिस्थिति में काम आता है।
चर्चा के दौरान मनीष जी ने कहा कि हमारे साथ प्रबुद्ध वर्ग के सदस्य विद्या वारधि तिवारी जी जुड़े हुए हैं, जो संघ की पृष्ठभूमि से नहीं हैं, लेकिन संघ की विचारधारा और हिंदुत्व के लिए अपने स्तर पर प्रयास कर रहे हैं। विद्या वारधि तिवारी जी भी इस चर्चा में शामिल हैं। वे हमें जमीनी हकीकत से अवगत कराएंगे और तीसरे अंपायर के रूप में यह बताएंगे कि किन कारणों से संघ का विस्तार नहीं हो पा रहा है। तिवारी जी का अनुभव और दृष्टिकोण हमें इस संकट से उबरने में मदद कर सकता है।"
"मनीष जी के आग्रह पर गोष्ठी में प्रबुद्ध वर्ग से विद्या वारधि तिवारी जी ने विषय को आगे बढ़ाया और उन्होंने कहा, 'हम लोग पिछले कुछ समय से रीवा में श्रीराम दरबार के रूप में एक छोटा, लेकिन प्रभावी प्रकल्प चला रहे हैं। इस पहल का उद्देश्य राम के आदर्शों को समाज में फैलाना और हिंदू समाज को संगठित करना है। हमने रामलला के मंदिर के भव्य प्राण प्रतिष्ठा की पहली वर्षगांठ के अवसर पर प्रतिष्ठा द्वादशी, 11 जनवरी 2025 को पंचमठा धाम, रीवा में एक बड़ा आयोजन करने की योजना बनाई थी, जिसमें 10,000 से अधिक लोग सम्मिलित हुए थे। इस आयोजन में केवल भगवान राम की तस्वीर लगी थी, और हमने यह सुनिश्चित किया था कि किसी भी संगठन, नेता या मंत्री की तस्वीर न लगे, ताकि किसी प्रकार का राजनीतिक विवाद या प्रतिस्पर्धा न हो। यहां तक कि श्रीराम दरबार के पदाधिकारियों और हमारे स्वयं के चित्र भी नहीं लगे, ताकि कार्यक्रम का उद्देश्य स्पष्ट और शुद्ध रहे, जो कि केवल भगवान राम के आदर्शों का प्रचार था।'"
इस कार्यक्रम का उद्देश्य हिंदू समाज को एकजुट करना और उनमें जागृति लाना था, ताकि हम सभी मिलकर समाज में सकारात्मक परिवर्तन ला सकें। लेकिन संघ के रीवा नगर में संघ की विचारधारा को सही ढंग से न समझने वाले कुछ व्यक्तियों ने इसे प्रतिस्पर्धा के रूप में देखा और इसे गलत संदर्भ में लिया। क्योंकि हमारा उद्देश्य केवल एक है - सनातन धर्म और हिंदुत्व के विचारों का प्रचार करना, जो संघ की विचारधारा के अनुरूप है, और यह सुनिश्चित करना कि प्रत्येक व्यक्ति हिंदू समाज की एकता को महसूस करे और इसमें भाग ले।
इसके अलावा, उन्होंने यह भी कहा कि हम लोग कुछ वर्षों से देख रहे हैं कि आज के समय में संगठन में बदलाव लाने की आवश्यकता महसूस हो रही है। संगठन के ढांचे में कुछ कारणों से प्रतिभाशाली व्यक्तियों को वह अवसर नहीं मिल पा रहे हैं जो उन्हें मिलना चाहिए। ऐसे लोगों को अवसर देने की आवश्यकता है, ताकि संगठन में और अधिक निखार आए। इसके साथ ही, निस्वार्थ भाव से कार्य करने वाले स्वयंसेवकों को भी प्रोत्साहित किया जाए, ताकि वे भी अपने कार्यों को और प्रभावी रूप से कर सकें। जो लोग अपने स्तर पर समाज के लिए कार्य कर रहे हैं, उनका उत्साहवर्धन करना भी आवश्यक है, ताकि वे और अधिक प्रभावी तरीके से कार्य कर सकें।"
इसके बाद, सूरज नारायण पाण्डेय जी ने विषय प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी ने उन्हें यह बताया कि हम अभी ट्रेन में हैं, इसलिए वे विषय पर विस्तार से नहीं बात कर पाएंगे। हालांकि, उन्होंने तीन प्रमुख बिंदुओं पर चर्चा की। पहले बिंदु में उन्होंने यह प्रश्न उठाया कि शाखा सही तरीके से नहीं चल रही है और संगठन में कुछ विकृतियां आ रही हैं। उन्होंने यह भी कहा कि शाखा सही ढंग से नहीं चल रही, लेकिन संघ के प्रकल्प और विचारों से प्रेरित कार्य अलग-अलग स्तरों पर चल रहे हैं, जिनका प्रभाव जमीन पर दिखाई दे रहा है।
इसके बाद, उन्होंने बताया कि संघ का मूल विचार यही है कि शाखा पद्धति को समय के साथ अनुकूलित किया जाए। खासकर, शहरी क्षेत्रों में मिलन कार्यक्रम और अन्य आयोजनों के माध्यम से शाखा पद्धति को ज्यादा प्रभावी तरीके से पहुंचाने की आवश्यकता है। साथ ही, ग्रामीण इलाकों में शाम की शाखाओं को जोड़ने की आवश्यकता पर भी बल दिया गया, ताकि संघ के विचार और कार्य व्यापक रूप से फैल सकें।
इसके अलावा, गोष्ठी में जुड़ी केरल की प्रीति जी ने गौ संरक्षण के विषय पर अपने लेख के बारे में और केरल की प्रसिद्ध पंगुर गाय के बारे में बताया। प्रभा जी ने सेवा कार्य के बारे में बताया और अपने विचार व्यक्त किए।"
निखिलेश शांडिल्य जी ने अंत में विषय रखते हुए गोष्ठी का समापन किया। उन्होंने बताया कि आज के युग में, जहां आधुनिक प्रौद्योगिकी और अन्य कई कारणों से समाज में परिवर्तन हो रहे हैं, वहीं संघ की शाखाओं में संख्या कम हो रही है। मैं महाविद्यालयीन इकाई और प्रांत सोशल मीडिया के कार्य को देख रहा हूं। इसके अलावा, संघ में जो बदलाव हो रहे हैं, वे अपेक्षित गति से नहीं हो रहे हैं। पहले संघ की शाखाओं में लगभग 400 खेल होते थे और उनकी एक पुस्तिका भी होती थी, लेकिन आज प्रौद्योगिकी के कारण बहुत कुछ बदल चुका है, इसलिए हमें समय के साथ प्रौद्योगिकी में उन्नति करने की आवश्यकता है।
"उन्होंने एक और बात कही कि आज के संघ के बौद्धिक विचारों में नया दृष्टिकोण दिखाई नहीं दे रहा है। वही बातें पुनः सुनाई देती हैं, जो पहले पढ़ी और समझी गई थीं। आज के जागरूक समाज में बहुत से लोग अपने स्तर पर साहित्य का अध्ययन कर रहे हैं। इसके अलावा, संघ को पुराने गीतों का सहारा लिया जा रहा है, जिनमें संघर्ष की बातें की गई हैं। विचार गोष्ठी की शुरुआत में जो गीत नित्यप्रकाश भैया जी ने लिया, 'जिस दिन सोया राष्ट्र जगेगा', वह संघर्ष के गीत है, लेकिन आज के समय के अनुरूप गीतों का निर्माण नहीं हो पा रहा है। क्योंकि आज हम वैभवशाली बन रहे हैं, हिंदू समाज में जागृति आ रही है, इसलिए आज के संदर्भ में गीतों की रचना होनी चाहिए।"
उन्होंने एक और उदाहरण दिया कि दिल्ली में महाविद्यालयीन ईकाई का एक वर्ग आयोजित किया गया था, जिसमें एक विद्यार्थी ने यह प्रश्न पूछा कि क्या मुस्लिम लोग संघ की शाखा में आ सकते हैं। संघ अधिकारी ने उत्तर दिया, "हां, वे आ सकते हैं।" विद्यार्थी ने फिर पूछा, "क्या आपने हदीस और क़ुरान पढ़ा है?" उत्तर में अधिकारी ने कहा, "नहीं," तो विद्यार्थी ने कहा, "आप मेरे सवाल का उत्तर देने के योग्य नहीं हैं," और वह बैग उठाकर वहां से चला गया।
"उन्होंने एक बात और कही कि सजय जी ने एक टिप्पणी की कि महाराणा प्रताप की जन्मजयंती है, लेकिन आज एक महान क्रांतिकारी की जन्मजयंती है, जिनके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। अहिल्या बाई होलकर, जिनकी इस वर्ष संघ 350वीं जन्मजयंती संघ मना रहा हैं। लेकिन उनकी जन्मजयंती मनाते हुए हम यह भूल गए कि उन्होंने कितने मंदिरों का उत्थान किया और समाज में किस प्रकार के सेवा कार्य किए। इसके बावजूद, जिन मल्हार राव होलकर की वजह से यह सब संभव हो पाया, उनका कोई उल्लेख नहीं करता। इसके अलावा, डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर और सावित्री फुले को प्रातः स्मरणीय बनाते हुए, उनके द्वारा प्रस्तुत हिंदू धर्म और सनातन धर्म की परंपराओं और डॉ. आंबेडकर की 22प्रतिज्ञाओं का भी कहीं उल्लेख नहीं होता। लोग इन सब बातों को पढ़ रहे हैं, इसलिए प्रश्न भी उठेंगे। हमें समय के साथ बदलने की आवश्यकता है।
उन्होंने यह भी बताया कि आजकल नवसंघी लोग संघ में आ गए हैं, जो संघ के अधिकारियों के समक्ष एक तरह का मायाजाल बुनते हैं, जिससे उन्हें जिले और प्रांत के दायित्व दिए जाते हैं। जो लोग निस्वार्थ भाव से कार्य कर रहे हैं, वे खुद को ठगा महसूस करते हैं। लेकिन हम स्वयंसेवक कभी निराश नहीं होंगे, क्योंकि हम लोगों ने अपने खून-पसीने से संघ को सींचा है। हमारे परिश्रम का ही फल है कि संघ एक बड़ा वटवृक्ष बन चुका है। हम संघ में रहकर उसमें सुधार लाएंगे और गलत लोगों को संघ से बाहर करेंगे।
गोष्ठी का समापन इस वाक्य के साथ हुआ:
"संगठनों को कभी तो यह सोचना पड़ेगा कि निस्वार्थ कार्यकर्ता को सक्षम बनाना है या सक्षम को कार्यकर्ता बनाना है?"
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संकलनकर्ता
दीपक कुमार द्विवेदी
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