अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः

💐🚩 *21 जनवरी 2025 दिन मंगलवार* 🚩💐
    💐🚩 *माघ कृष्ण पक्ष अष्टमी 2081* 🚩💐
     *श्रीमद्भगवदगीता के अध्याय 3 का श्लोक 14* 

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 *अर्थ* 
        सभी लोग अन्न पर निर्भर हैं और अन्न वर्षा से उत्पन्न होता हैं, वर्षा यज्ञ का अनुष्ठान करने से होती है और यज्ञ निर्धारित कर्मों का पालन करने से सम्पन्न होता है।
 *व्याख्या* 
            इस श्लोक में श्रीकृष्ण सृष्टि के चक्र का वर्णन कर रहे हैं। वर्षा अन्न उत्पन्न करती है। अन्न का सेवन करने से शरीर में रक्त संचारित होता है और रक्त से वीर्य बनता है। इसी वीर्य बीज से मनुष्य का शरीर बनता है और मनुष्य यज्ञ कर्म करता है तथा इससे स्वर्ग के देवता संतुष्ट होते हैं जो फिर पृथ्वी पर वर्षा करते हैं। इस प्रकार सृष्टि का चक्र निरन्तर चलता रहता है।
          चार वेद, ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद एवं अथर्ववेद, ईश्वरीय ज्ञान है जिसे सर्वव्यापक, सर्वज्ञ व सर्वशक्तिमान सृष्टिकर्ता ईश्वर ने सृष्टि के आरम्भ में चार ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा को दिया था। ईश्वर प्रदत्त यह ज्ञान सब सत्य विद्याओं की पुस्तक है। वेद सभी मनुष्यों के लिए यज्ञ करने का विधान करते हैं। ऋग्वेद के मन्त्र 1/13/12 में *‘स्वाहा यज्ञं कृणोतन’* कहकर ईश्वर ने स्वाहापूर्वक यज्ञ करने की आज्ञा दी है। ऋग्वेद के मन्त्र 2/2/1 में ‘ *यज्ञेन वर्धत जातवेदसम्’* कहकर यज्ञ से अग्नि को बढ़ाने की आज्ञा है। इसी प्रकार यजुर्वेद के मन्त्र 3/1 में ‘ *समिधाग्निं दुवस्यत धृतैर्बोधयतातिथिम्* ’ कहकर समिधा से अग्नि को पूजित करने व घृत से उस अग्निदेव अतिथि को जगाने की आज्ञा है। ‘ *सुसमिद्धाय शोचिषे घृतं तीव्रं जुहोतन* ’ (यजुर्वेद 3/2) के द्वारा आज्ञा है कि सुप्रदीप्त अग्निज्वाला में तप्त घृत की आहुति दो। 
        यह संसार ईश्वर का बनाया हुआ है और सभी मनुष्यों व प्राणियों को उसी ने जन्म दिया है। अतः ईश्वर सभी मनुष्यादि प्राणियों का माता, पिता व आचार्य है। उसकी आज्ञा का पालन करना ही मनुष्य का धर्म है और न करना ही अधर्म है। इस आधार पर यज्ञ करना मनुष्य धर्म और जो नहीं करता वह अधर्म करता है। इस प्रकार मनुष्य को यज्ञ कर्म का पालन करते हुए जीवन निर्वाह करने से सृष्टि का चक्र निरंतर चलता रहेगा।
 *जय श्री कृष्ण* 💐🚩🙏

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