#राष्ट्रवादी वर्ग ट्रंप के आने से उत्साहित हैं, यहां तक कि कल #ट्रंप के फैसले से बहुत ज्यादा उत्साहित थे। लेकिन यह राष्ट्रवादी वर्ग भूल गया है कि ट्रंप अमेरिका में वामपंथ के विरुद्ध लड़ रहे हैं। अमेरिका में वामपंथ के विरुद्ध लड़ाई का इतिहास बहुत लंबा है, लेकिन भारत में पिछले 60 से 65 वर्षों से ओल्ड वामपंथ और न्यू वामपंथ समाजवादी नीतियों के रूप में पहले से चल रहा है। 1955 में प्रधानमंत्री #नेहरू द्वारा सोवियत संघ से प्रेरित सम्मवादी नीतियों को पंचवर्षीय योजना के रूप में अपनाने के साथ, 1967 में #इंदिरा_गांधी द्वारा बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया था। 1975 में कम्युनिस्टों से #आपातकाल का समर्थन लेने के लिए पूरी शिक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक तंत्र #कम्युनिस्टों के हवाले कर दिया गया। #शिक्षा नीति लेकर सभी सरकारी विभागों में बड़े-बड़े कम्युनिस्टों को बैठाया गया। यह क्रम आज भी जारी है। यहां तक कि कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े लोगों को सरकारी नौकरी दी गई है और उन्हें सरकारी विभागों में बड़े पदों पर नियुक्त किया गया।
1975 में इंदिरा गांधी द्वारा आपातकाल के दौरान, जब सभी नेता जेल में थे, तब 42वें संविधान संशोधन के माध्यम से संविधान की प्रस्तावना में जबरदस्ती #सेकुलरिज़्म और #समाजवाद शब्द जोड़े गए, जो सोवियत संघ की सम्मवादी आर्थिक नीति का एक रूप था। इसके कारण 1990 आते-आते पूरी आर्थिक व्यवस्था पूरी तरह से ध्वस्त हो गई थी। 1989 में सोवियत संघ के ढहने के बाद ओल्ड वामपंथ का अंत हो गया। उस समय में मजबूरी में वर्ल्ड बैंक और IMF के दबाव में तत्कालीन सरकार को 1991 में उदारीकरण की शुरुआत करनी पड़ी। #साम्यवादी और समाजवादी आर्थिक नीतियों के कारण हमें अपना सोना गिरवी रखना पड़ा था, आयात खर्च उठाने के लिए पैसे नहीं थे। 1991 में तो बड़े आर्थिक सुधार हुए, लेकिन संवैधानिक और प्रशासनिक स्तर पर कम्युनिस्ट समाजवादी सिस्टम चलता रहा।
रूस की बोल्शेविक क्रांति के बाद भी विभिन्न देशों में मजदूर संगठित नहीं हुए और कोई बड़ी क्रांति नहीं हुई। एक बात यहाँ महत्वपूर्ण है कि बोल्शेविक क्रांति भी मार्क्सवादी विचारधारा का परिणाम नहीं थी, बल्कि जारशाही से उकताए सामान्य जन के असंतोष का परिणाम थी। लेनिन उस समय पेरिस में था और क्रांति के बाद वह अपना ठप्पा लगाने रूस आ पहुंचा। रूस में क्रांति के वही कारण थे जो फ्रांस, अमेरिका और इंग्लैंड में थे। लेनिन ने रूस की क्रांति पर मार्क्सवाद का मुलम्मा इसलिए चढ़ाया ताकि वह वहां का अधिनायक बन सके और अपने कृत्यों को नैतिक रूप से सही ठहरा सके। फिर भी सोवियत रूस में जैसा हुआ, वैसा ही वामपंथी हर देश में चाहते थे, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। सोवियत संघ के बाद दूसरी क्रांति दुनिया में नहीं हुई। इस विषय पर कम्युनिस्ट विचारकों में बहुत चिंतन हुआ और इसी में से एक विचारक एंटोनियो ग्राम्सी थे, जिन्होंने यह विचार दिया कि बोल्शेविक जैसी क्रांति दुनिया भर में क्यों नहीं हुई। इसका कारण यह था कि मजदूर वर्ग धर्म, संस्कृति, परिवार और राष्ट्र की अवधारणा से जुड़ा हुआ था। इसलिए जब तक धर्म, परिवार और राष्ट्र जैसी संस्थाओं को समाप्त नहीं किया जाएगा, तब तक इस दुनिया में क्रांति संभव नहीं थी। इसी कल्चरल मार्क्सवाद की विचारधारा का जन्म हुआ, जिसमें यह सिद्धांत था कि परिवार, धर्म, संस्कृति, और राष्ट्र जैसी हर संस्था को खत्म करके नई व्यवस्था खड़ी करनी चाहिए। इसके सिद्धांत में द्विआधारी सिद्धांत और समाज में दोहरा अलगाव जैसे "राम श्रेष्ठ रावण है", "माता दुर्गा श्रेष्ठ महिषासुर है", "यह जाति, वह जाति", "यह क्षेत्र, वह क्षेत्र" जैसी विचारधाराओं को बढ़ावा दिया गया। इसके अलावा समाज में अलग-अलग नई पहचान बनाने का प्रयास किया गया। कल्चरल मार्क्सवाद का आधार पहचान की राजनीति है। #कल्चरल_मार्क्सवादी हर चीज को खारिज करते हैं।
#कल्चरल_मार्क्सवाद का प्रभाव भारत में पिछले कुछ वर्षों में बहुत बढ़ा है। हर क्षेत्र में वामपंथियों ने भारतीय समाज व्यवस्था को ध्वस्त करने का प्रयास किया, चाहे वह गलत #इतिहास लिखने का हो या शिक्षा व्यवस्था में वामपंथी वोक कल्चर घुसाने का। आज के समय में #सेक्स एजुकेशन को सिलेबस का हिस्सा बना दिया गया है। इसके अलावा समलैंगिकता और समलिंग विवाह पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई है। #LGBTQ को कांग्रेस ने 2024 के चुनावी मे घोषणापत्र में शामिल किया था। #LGBTQ समुदाय के समर्थन में अलग-अलग शहरों में सतरंगी फेरेड मार्च निकाले गए हैं। लिव-इन रिलेशनशिप, फ्री सेक्स जैसी अवधारणाओं को बढ़ावा दिया जा रहा है। यह सब कुछ #भारत में खुलेआम चल रहा है, जो भविष्य में विवाह नामक संस्था के विकल्प के रूप में खड़ा किया जाएगा। क्योंकि कल्चरल मार्क्सवाद के मूल में परिवार और विवाह जैसी संस्थाओं को खत्म करके नई व्यवस्था स्थापित करना है।
संयुक्त #परिवार व्यवस्था को ध्वस्त करने के लिए "छोटा परिवार, सुखी परिवार" जैसे नारे लिखे गए और परिवार नियोजन के लिए सरकारी स्तर पर प्रयास किए गए। सबकुछ कल्चरल मार्क्सवाद के नारेटिव के अनुसार हुआ। बैल्क लाइव्स मैटर के तर्ज पर दलित लाइव्स मैटर चलाया जा रहा है। हिंदू बनाम बौद्ध मूलनिवासी थ्योरी और इसके अलावा अलग-अलग जातियों और पहचान को क्रिएट किया जा रहा है, जैसे "क्षत्रिय मूल निवासी संघ" जो क्षत्रिय धर्म को हिंदू धर्म से अलग बता रहे हैं। इसके अलावा #धर्म को अफ़ीम बताने की कोशिश की जाती है। पूजा-पाठ और कर्मकांड पर प्रश्नचिन्ह खड़े किए जाते हैं। इसी संदर्भ में नया ट्रेंड चलता है, जैसे कोई नेता कहेगा "पुरानी बातें क्यों करते हो, मंदिर-मस्जिद की बात क्यों करते हो, भारत माता की जय क्यों बोलते हो, क्योंकि भारत कभी राष्ट्र नहीं रहा।" हजारों वर्षों की संस्कृति की बात क्यों करते हो? भारत की खोज एक पुर्तगाली वास्कोडिगामा ने की थी, इसके पहले भारत था ही नहीं। लोग इस तरह से प्रश्न खड़े करते हैं, जिससे लोग भारतीय इतिहास और परंपरा को मिथ्या मानने लगे। इसीलिए भारत का इतिहास गलत लिखा गया, जिससे भारतीय कभी नहीं समझ पाए। भारत में कल्चरल मार्क्सवाद के नारेटिव का रायता बहुत बड़े स्तर पर फैला हुआ है। इसे समेटने की आवश्यकता है।
ट्रंप के आने से हमें चार वर्षों का एक स्वर्णिम अवसर मिला है। हमें इस विषय को गंभीरता से समझना होगा और इस खतरे से निपटने के लिए सब मिलकर काम करना होगा। क्योंकि इस चार वर्षों के समय में वामपंथ के विरुद्ध इस लड़ाई को मुकाम तक पहुंचा सकते हैं। कल्चरल मार्क्सवाद के जहरीले नारेटिव का काउंटर कर पाएंगे, तो हम वर्तमान पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी को बचा पाएंगे। अगर इस लड़ाई को मुकाम तक नहीं पहुंचा पाए, तो आने वाली पीढ़ी को हम खो देंगे। जो सपने हम लोगों ने देखे हैं, "21वीं सदी भारत की होगी", "आने वाली दस सदी हमारी होगी", वह सपना चकनाचूर हो जाएगा।
दीपक कुमार द्विवेदी
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