हिंदू परिवार व्यवस्था सुदृढ़ करना क्यों आवश्यक है ?

आज के समय में हिन्दू परिवार-व्यवस्था को सुदृढ़ करना अत्यन्त आवश्यक है। यदि हिन्दू परिवार सुदृढ़ एवं सशक्त रहें, तो हम भविष्य में आने वाले संकटों का सामना सुगमता से कर सकेंगे। किन्तु यदि सरकार नारीवादियों, वामपंथियों एवं पाश्चात्य शक्तियों के दबाव में आकर जनसंख्या-नियंत्रण विधेयक बनाने की भूल करती है, तो न तो परिवार सुरक्षित रहेंगे और न ही हमारे पास पर्याप्त जनसंख्या-शक्ति शेष रहेगी। म्लेच्छ समुदाय पर लोकतांत्रिक व्यवस्था के अन्तर्गत कोई भी विधि लागू करना अत्यन्त दुष्कर सिद्ध होता है।

इसी कारण, जनसंख्या-नियंत्रण विधेयक अत्यन्त आत्मघाती विचार है। "छोटा परिवार, सुखी परिवार" जैसे नारों के परिणामस्वरूप हिन्दुओं की जनसंख्या में भारी कमी हुई है और यह निरन्तर घटती जा रही है। यदि हिन्दू समाज ने शीघ्र ही दो या तीन संतानों को उत्पन्न करना आरम्भ नहीं किया, तो भविष्य में हिन्दू समाज के हाथ से सब कुछ रेत के समान फिसल जाएगा।

हम सबको अगले 25 वर्षों का लक्ष्य यह होना चाहिए कि हिन्दुओं की जनसंख्या कैसे बढ़ाई जाए और संयुक्त परिवार-व्यवस्था को आज के वैश्वीकरण के युग में कैसे पुनः सुदृढ़ किया जाए। इसके लिए हमें अपने स्तर पर क्या किया जा सकता है, इस विषय पर विचार-विमर्श, चिंतन-मंथन एवं योजना बनाकर कार्य करने की आवश्यकता है। यदि इस क्षेत्र में यथोचित प्रयास नहीं किए गए, तो न हमारी लोक परंपरा बचेगी, न संस्कृति, और न ही धर्म। लोकतंत्र में जिसका बहुमत होता है, सत्ता उसी के अधीन होती है। इस तथ्य को हमें ध्यान रखना चाहिए, अन्यथा परिस्थितयाँ अत्यन्त विकट हो जाएंगी और नियंत्रण से परे चली जाएंगी।

वैश्वीकरण के इस युग में हिन्दू परिवार-व्यवस्था को सुदृढ़ करना अत्यन्त बड़ी चुनौती है। इस विषय पर सतत प्रयास करना आवश्यक है। जब चीन जैसे राष्ट्र ने एक संतान नीति को छोड़कर तीन संतान नीति को अपनाया और तीन संतानों को जन्म देने पर चीन की सरकार 23 लाख रुपये का प्रोत्साहन दे रही है, तब हम "हम दो, हमारे दो" जैसे नारों में उलझकर अपना सुव्यवस्थित तंत्र नष्ट कर चुके हैं। हमने अपने ही हाथों अपनी कब्र खोद ली। इसे परिवर्तित करने हेतु संगठित प्रयास करना अपरिहार्य है।

चीन ने सन् 1979 में एक-संतान नीति अपनाई थी, जिसके परिणामस्वरूप आज उसके पास कार्यशील जनशक्ति का अभाव हो गया है। चीन की अधिकांश जनसंख्या वृद्धावस्था को प्राप्त हो चुकी है। वर्तमान में भारत की 65% जनसंख्या युवावस्था में है, किन्तु आगामी 30 वर्षों में यह भी वृद्धावस्था में परिवर्तित हो जाएगी। प्रतिस्थापन दर वर्तमान में इतनी पर्याप्त नहीं है कि इस अंतर को भर सके। यदि इस दिशा में समय रहते उचित योजनाएँ नहीं बनाई गईं, तो भविष्य में भारत भी यूरोप और चीन के समान वृद्ध-प्रधान राष्ट्र बन जाएगा। अतः इस संकट की गम्भीरता को समझते हुए दीर्घकालिक योजनाएँ बनाना अत्यन्त आवश्यक है।


ग्लोबल मार्केट फोर्सेज अपने लाभ के लिए वामपंथियों को वित्तपोषित करके वामपंथियों के माध्यम से विवाह, परिवार, धर्म, संस्कृति और राष्ट्रीय धर्म जैसी संस्थाओं को ध्वस्त करना चाहती हैं। ऐसी शक्तियों को किस प्रकार उत्तर दिया जाए, यह हिंदूवादी शक्तियों का कर्तव्य होना चाहिए, ताकि वे सदा सशक्त रहें और विधर्मियों द्वारा जनसंख्या संतुलन में परिवर्तन न किया जा सके, इसकी चिंता हमें करनी चाहिए। कुटुम्ब प्रबोधन, साप्ताहिक हनुमान चालीसा पाठ, साप्ताहिक मिलन, समस्त जाति-वर्गों के साथ सहभोजन, संस्कारशाला, संघ की शाखाओं का ग्रामीण स्तर पर विस्तार—इन सबके माध्यम से संयुक्त परिवार व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए कार्य किया जा सकता है।


✍️दीपक कुमार द्विवेदी

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