पानीपत के बलिदानी: पंडित गोविंद पंत बुंदेला की वीरगाथा

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बाजीराव का सबसे प्यारा सरदार जिसने श्रीमंत के आदेश पर अपना घर छोड़कर उत्तर में 35 साल लगाए और मराठा साम्राज्य के लिए सबसे ज्यादा धनार्जन किया, उसका नाम था पंडित गोविंद पंत बुंदेला । 

गोविंद पंत की बुद्धि का लोहा बाजीराव से लेकर भाऊ राव तक सब मानते थे । इसीलिए उनका कटा सर देखकर भाऊ की बुद्धि कुंद हो गई थी और पूरी मराठा सेना में सन्नाटा छा गया था । गोविंद पंत मराठों मध्य और उत्तर के अभियान में हमेशा साथ रहे चाहे फिर बाजीराव का बुंदेलखंड अभियान रहा हो या राघोबा का अमृतसर अभियान । गोविंद पंत ने अब्दाली को दोआब में इतना फंसा कर रख दिया था कि अब्दाली ने ये तय किया कि पूरी मराठी सेना से बाद में निबटेंगे, पहले इस पंडित को निबटाया जाए । पन्त के साथ नौ हजार की हल्की फुल्की फौज थी। उन्होंने उसे कई दस्तों में बांटा था। पानीपत में अब्दाली की छावनी की ओर जानेवाले सभी रास्तों को उन्होंने लूट लिया और नाकाबन्दी कर दी। गाड़ी घोड़ों को रोक लिया गया। ऊँटों पर लदी रसद पर काबू कर लिया। घोड़े जब्त कर लिये। भाऊ का भाव भरा संदेशा आते ही ढलती उम्र में भी पन्त उभरती जवानी जैसे उत्साह से काम में जुट गये थे । 

पंत के सरदारों और बेटे ने उन्हें समझाने की कोशिश भी पर बूढ़ा शेर कहां मानने वाला था ? वो नहीं रूका और दौड़ भाग में अपना पूरा शरीर तोड़ डाला । थकान और बीमारी इतनी हावी हो गई कि जब गिलचों ने उनकी छोटी सी टुकड़ी पर आक्रमण किया तो खुद को संभाल नहीं पाए । हमले के वक्त पंत जी नहा रहे थे । जैसे ही आक्रमण हुआ वो तुरंत गीले कपड़ो में घोड़े पर दौड़े पर घोड़ा ठोकर खाकर गिर पड़ा। किसी तरह बालाजी पंत ने उन्हें घोड़े पर बिठाया पर बूढ़ी, भारी और थकी देह ज्यादा दूर तक घोड़े पर टिक न सकी । थोड़ा आगे चलते ही पंत जी फिर गिर पड़े । उनको उठाने बालाजी और सैनिक दो बार वापस आये भी, घोड़े पर उन्हें बिठाए भी, पर पंत जी कमजोर हो चुके थे । और उनके लिए बालाजी और सैनिक रुकते तो कोई भी नहीं बचता। क्या करुण दृश्य रहा होगा जब एक बेटा अपने बाप को गिलचों से घिरता हुआ देख रहा होगा पर स्वयं को उसकी मदद के लिए रोक नहीं पा रहा होगा । बालाजी और उनके 500 घुड़सवार तो किसी तरह जान बचाकर दिल्ली पहुंच गए पर पंत जी की सिर्फ कटे हुए सर के रूप में पहुंचे जिसको अब्दाली के संदेशवाहको ने भाऊ राव के पास पहुंचाया ।

गोविंद पंत का जन्म महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के 'नेवारे' गांव में करहड़े ब्राह्मण परिवार में 1710 के आसपास हुआ था। उनके पिता गांव के कुलकर्णी थे और पिता की असमय मृत्यु के बाद गोविंद पंत को यह पद मिला। हालांकि, घुमक्कड़ प्रवृति के कारण उन्हें पद और अपना गृहनगर छोड़ना पड़ा । अपने करियर की शुरुआत में, उन्होंने उत्तर भारत के स्थापित मराठा सेनापतियों: मल्हारराव होलकर और अंताजी मनकेश्वर गंधे के अधीन काम किया। उन्होंने गुरिल्ला युद्ध और प्रशासन में अच्छा अनुभव प्राप्त किया। देशस्थ ब्राह्मण अंताजी की सिफारिश पर, बाजीराव पेशवा ने गोविंद पंत को कुछ काम सौंपे और उन्हें बेहद उपयोगी पाया। जल्द ही वह बाजीराव के सबसे पसंदीदा सेनापतियों में से एक बन गए। जब बाजीराव को 1733 में महाराजा छत्रसाल से बुंदेलखंड मिला , तो उन्होंने गोविंदपंत को इस नई भूमि के लिए अपना प्रशासक और पावर ऑफ अटॉर्नी नियुक्त किया।

पेशवा की अनुमति के साथ 1735-1736 में, उन्होंने ' सागर ' नामक एक नया शहर बनाया और इसे अपनी राजधानी बना दिया। उन्हें हमेशा मराठा साम्राज्य का सबसे बड़ा ' फंड राइज़र ' माना जाता था ।

1738 से 1760 तक गोविन्द पंत का दबदबा बुंदेलखंड और दोआब में रहा। सागर, जालौन और गुरसराय रियासतें इनके द्वारा ही स्थापित की गईं थीं। गोविन्द पन्त ने बड़े पुत्र बालाजी को सागर का प्रबंध सौपा और छोटे पुत्र गंगाधर राव के साथ कालपी आए तथा कालपी, उरई, जालौन आदि का इलाका उनको देकर इधर का कार्य भार सौंपा। इन्ही गंगाधर राव के पुत्र और वंशज ही बाद में जालौन के राजा कहलाए। गोविन्द पन्त ने अपने एक संबंधी को गुरसराय का इलाका दिया जो बाद में गुरसराय के राजा के नाम से जाने गए। कालपी में गंगाधर राव को कालपी का किला मिला जहाँ उन्होंने अपना घर और मुख्यालय बनाया। 

मराठा इतिहास में इनको पन्त साहब के नाम से जाना जाता है। बुन्देलखंड में इनको गोविन्द पन्त बुंदेला का नाम मिला। गोविन्द पन्त की एक पुत्री भगीरथी बाई थी जिसका विवाह उन्होंने सागर के विशा जी गोविन्द चन्दोरकर के साथ किया । गोविन्द पन्त ने इन प्रान्तों का प्रबंध इतनी अच्छी तरह से किया कि कि पेशवा ने उनको पालकी का प्रयोग करने का अधिकार भी दिया जो पेशवा के राज में बड़े सम्मान और आदर की सूचक बात थी। 

✍️ निखिलेश

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