प्रयागराज महाकुंभ हादसा: एक सुनियोजित साजिश?

भारत में पिछले कुछ वर्षों में जिस प्रकार की घटनाएं घट रही हैं, उनके पीछे एक गहरा वैचारिक युद्ध चल रहा है। वामपंथी शक्तियाँ और उनके सहयोगी कांग्रेस लोगों के मन में यह धारणा बैठाने का प्रयास कर रहे हैं कि कांग्रेस के शासनकाल में सब कुछ अच्छा था, लेकिन मोदी और योगी के सत्ता में आने के बाद देश में अव्यवस्था और संकट आ गया। यह केवल एक राजनीतिक प्रोपेगेंडा नहीं, बल्कि एक व्यापक षड्यंत्र का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य देश में अराजकता फैलाकर सत्ता परिवर्तन सुनिश्चित करना है।

प्रयागराज में महाकुंभ के दौरान हुई दुर्भाग्यपूर्ण घटना को मात्र एक दुर्घटना कहना उचित नहीं होगा। यदि इस पूरे घटनाक्रम का गहराई से विश्लेषण किया जाए, तो स्पष्ट होता है कि इसके पीछे एक योजनाबद्ध षड्यंत्र था। 10 करोड़ श्रद्धालुओं की भीड़ में कुछ ऐसे तत्व प्रवेश कराए गए थे, जिनका उद्देश्य इस पावन आयोजन को कलंकित करना और भारत की धार्मिक एवं सांस्कृतिक छवि को धूमिल करना था।
इस षड्यंत्र का मुख्य उद्देश्य यह था कि कुंभ मेले में अराजकता फैलाई जाए और हजारों निर्दोष लोगों को हताहत कर दिया जाए। हालांकि, सुरक्षा बलों और प्रशासन की तत्परता के कारण यह षड्यंत्र पूरी तरह सफल नहीं हो पाया, लेकिन इस घटना के बाद जिस प्रकार की मीडिया रिपोर्टिंग हुई, उससे स्पष्ट होता है कि एक विशेष नैरेटिव गढ़ने की तैयारी पहले से ही थी।

वामपंथी विचारधारा हमेशा से भारतीय मूल्यों, परंपराओं और आस्था के विरोध में रही है। वे न केवल धर्म और राष्ट्र की अवधारणा को अस्वीकार करते हैं, बल्कि उन सभी संस्थाओं पर भी हमला करते हैं, जो भारतीय संस्कृति और उसकी पहचान को संरक्षित करती हैं। परिवार, धर्म, राष्ट्र और सांस्कृतिक परंपराएँ—ये सभी उनके निशाने पर रहते हैं।
इसका सबसे बड़ा उदाहरण कुंभ मेला है। पहले वामपंथी इकोसिस्टम ने इसका मज़ाक उड़ाने का प्रयास किया। जब यह प्रयास विफल हुआ, तो उन्होंने कुंभ के संबंध में ऐसे विकृत नैरेटिव बनाए, जिससे लोग इसके वास्तविक महत्व को संदेह की दृष्टि से देखें। अब, जब कुंभ मेले में एक घटना घटी, तो संपूर्ण वामपंथी मीडिया उसी पूर्व-निर्धारित एजेंडे के अनुसार इसे प्रस्तुत कर रहा है।

यह केवल कुंभ मेले तक सीमित नहीं है। भारत में सांस्कृतिक मार्क्सवाद के तहत हर उस परंपरा और आयोजन को निशाना बनाया जा रहा है, जो हिंदू समाज को एकजुट करता है और उसकी आस्था को सशक्त बनाता है। चाहे दीपावली पर पटाखों का प्रतिबंध हो, चाहे गोवंश रक्षा की पहल का उपहास उड़ाना हो, या फिर मंदिरों की संपत्तियों पर सरकारी नियंत्रण हो—हर स्तर पर एक सुनियोजित षड्यंत्र के तहत भारतीय समाज की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को कमजोर करने का प्रयास किया जा रहा है।

यह सहयोग नहीं, प्रयोग है!

जो कुछ भी हो रहा है, वह मात्र संयोग नहीं, बल्कि एक गहरा प्रयोग है। इस प्रयोग के तहत भारतीय समाज की मूलभूत मान्यताओं और आस्थाओं को निरंतर चुनौती दी जा रही है। वामपंथी ताकतें जनता के मन में यह भ्रम उत्पन्न करने का प्रयास कर रही हैं कि वर्तमान सरकार के आने के बाद सभी समस्याएँ बढ़ गई हैं और यदि कांग्रेस सत्ता में आती है, तो सब कुछ ठीक हो जाएगा।

लेकिन यह विचारणीय है कि क्या वास्तव में कांग्रेस शासन के दौरान देश में कोई समस्याएँ नहीं थीं? क्या भ्रष्टाचार, आतंकवाद, बेरोजगारी, और सांप्रदायिक हिंसा कांग्रेस के शासनकाल में नहीं थी? वास्तविकता यह है कि वर्तमान सरकार के आने के बाद वामपंथी और उनके सहयोगी संगठनों की शक्ति कमजोर हुई है, और इसलिए वे किसी भी तरह से सत्ता परिवर्तन के लिए नए-नए षड्यंत्र रच रहे हैं।

आज भारत केवल एक राजनीतिक संघर्ष से नहीं, बल्कि एक वैचारिक युद्ध से गुजर रहा है। यह युद्ध केवल सत्ता के लिए नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा और पहचान के लिए लड़ा जा रहा है। हमें इस षड्यंत्र को पहचानना होगा और अपने समाज को इसके प्रति जागरूक बनाना होगा। अन्यथा, यह वामपंथी प्रयोग हमारे देश की सांस्कृतिक और राष्ट्रीय पहचान को धीरे-धीरे मिटा देगी ।

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