एक सशक्त हिंदू समाज ही एक शक्तिशाली भारत की नींव रख सकता है!



हिंदू समाज का उत्थान केवल धार्मिक और सांस्कृतिक चेतना से संभव नहीं है, बल्कि इसके लिए आर्थिक और प्रशासनिक सशक्तिकरण भी अनिवार्य है। जब तक हिंदू समाज आर्थिक रूप से संगठित और आत्मनिर्भर नहीं होगा, तब तक वह अपने अधिकारों और अस्तित्व की रक्षा करने में पूर्णतः सक्षम नहीं हो सकेगा। यह साक्षात् सत्य है कि किसी भी समाज की उन्नति का आधार उसकी आर्थिक शक्ति होती है। जब कोई समाज आर्थिक रूप से सशक्त होता है, तभी वह राजनीति, प्रशासन और समाज पर प्रभाव डाल सकता है। अतः आज प्रत्येक समर्थ हिंदू को यह संकल्प लेना चाहिए कि वह कम से कम पाँच हिंदू युवाओं को रोजगार योग्य बनाएगा और साथ ही, हिंदूनिष्ठ युवाओं को शासकीय विभागों में प्रवेश दिलाने हेतु भी सक्रिय भूमिका निभाएगा।

हिंदू समाज में धर्म और अर्थ का अटूट संबंध रहा है। आचार्य चाणक्य का प्रसिद्ध कथन है—"धर्मस्य मूलं अर्थः", अर्थात् धर्म का आधार अर्थ है। जब समाज आर्थिक रूप से सशक्त होता है, तभी वह अपने धार्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा कर पाता है। दुर्भाग्यवश, हिंदू समाज आज आर्थिक रूप से संगठित नहीं है। अन्य समुदायों ने अपने व्यापारिक और वित्तीय संसाधनों को एकजुट कर अपनी स्थिति को सुदृढ़ किया है, किंतु हिंदू समाज व्यक्तिगत स्तर तक सीमित रह गया है।

इतिहास पर दृष्टि डालें, तो पाएंगे कि प्राचीन भारत में हिंदू समाज अत्यंत समृद्ध था। वैश्विक व्यापार में भारत की भागीदारी सबसे अधिक थी। किंतु मध्यकाल में विदेशी आक्रमणों और ब्रिटिश शासन ने इस आर्थिक शक्ति को कमजोर कर दिया। जब तक भारत में सामंतवादी अर्थव्यवस्था थी, तब तक भी हिंदू समाज अपनी व्यापारिक स्थिति को बनाए रखने में सक्षम था। किंतु अंग्रेजों द्वारा भारतीय उद्योगों को नष्ट करने और व्यापार पर नियंत्रण लगाने के कारण हिंदू समाज धीरे-धीरे आर्थिक रूप से पिछड़ने लगा।

स्वतंत्रता के बाद समाजवाद आधारित आर्थिक नीतियों ने उद्योग और व्यापार पर सरकारी नियंत्रण बढ़ा दिया, जिससे हिंदू व्यापारियों को अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने का उतना अवसर नहीं मिला। किंतु 1991 के आर्थिक उदारीकरण के पश्चात एक नया परिवर्तन आया। पहली बार हिंदू समाज को अपनी आर्थिक क्षमता को पुनः स्थापित करने का अवसर मिला। इस उदारीकरण के परिणामस्वरूप एक मजबूत हिंदू मध्यम वर्ग का उदय हुआ। यह वह वर्ग था जिसने नई तकनीकों, व्यापार, और निजी उद्यमों में अपनी पहचान बनाई। यही कारण है कि 1991 के बाद हिंदू एकता में वृद्धि हुई, क्योंकि आर्थिक रूप से स्वतंत्र व्यक्ति ही अपने समाज और धर्म के प्रति अधिक जागरूक हो सकता है।

किन्तु आज भी हिंदू समाज की सबसे बड़ी समस्या यह है कि उसकी आर्थिक शक्ति संगठित नहीं है। अन्य समुदाय अपने व्यापार, रोजगार और आर्थिक संसाधनों को संगठित रूप से विकसित कर रहे हैं, जबकि हिंदू समाज अभी भी व्यक्तिगत प्रयासों तक सीमित है। हिंदू युवाओं को केवल नौकरी तक सीमित न रखकर व्यवसाय, उद्योग, स्टार्टअप और नवाचार की दिशा में भी आगे बढ़ाना होगा। पारंपरिक रूप से, हिंदू परिवारों में सरकारी नौकरियों को ही सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती रही है, जबकि अन्य समुदायों ने व्यापार और वित्तीय संस्थानों को विकसित करने पर अधिक ध्यान दिया।

हिंदू समाज को आत्ममंथन करने की आवश्यकता है। यदि वह आर्थिक रूप से सशक्त नहीं हुआ, तो आने वाले समय में वह अपनी सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान को बनाए रखने में कठिनाई महसूस करेगा। इस समस्या का समाधान केवल सरकारी नीतियों पर निर्भर नहीं हो सकता। प्रत्येक हिंदू को व्यक्तिगत और सामूहिक स्तर पर आर्थिक सशक्तिकरण की दिशा में कार्य करना होगा। हमें हिंदू युवाओं को स्वरोजगार और उद्यमिता के लिए प्रेरित करना होगा। उन्हें केवल नौकरी की मानसिकता से बाहर निकालकर व्यापार और स्टार्टअप की ओर बढ़ाना होगा।

साथ ही, हिंदू समाज को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि प्रशासनिक सेवाओं में हिंदूनिष्ठ युवाओं की भागीदारी बढ़े। यह अत्यंत आवश्यक है कि हिंदू समाज के प्रतिभावान युवा सिविल सेवा, न्यायपालिका, पुलिस, रक्षा, शिक्षा, और अन्य शासकीय विभागों में प्रवेश करें। जब तक प्रशासनिक तंत्र में हिंदू समाज का प्रतिनिधित्व नहीं होगा, तब तक समाज की आवश्यकताओं और हितों की रक्षा करना कठिन होगा। प्रशासनिक पदों पर पहुँचने से ही नीति-निर्माण में हिंदू समाज की भागीदारी सुनिश्चित होगी, जिससे उसके आर्थिक और सामाजिक अधिकारों की रक्षा की जा सकेगी।

इसके अतिरिक्त, हिंदू समाज को अपने आर्थिक संसाधनों को अपने ही समाज के भीतर बनाए रखना होगा। हमें स्वदेशी उत्पादों और सेवाओं को अपनाना चाहिए और अपने व्यापारियों और उद्यमियों को आर्थिक सहयोग देना चाहिए। अन्य समुदायों की तरह हिंदू समाज को भी सहकारी बैंकों, क्रेडिट सोसायटी और सामूहिक वित्त पोषण की व्यवस्था करनी होगी, ताकि छोटे व्यापारियों और उद्यमियों को वित्तीय सहायता मिल सके।

यदि हिंदू समाज को अपने अस्तित्व को बनाए रखना है, तो उसे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनना ही होगा। इसके लिए प्रत्येक समर्थ हिंदू को संकल्प लेना होगा कि वह पाँच हिंदू युवाओं को आत्मनिर्भर बनाएगा और अधिकाधिक हिंदू युवाओं को प्रशासनिक सेवाओं में भेजने हेतु सक्रिय भूमिका निभाएगा। आर्थिक शक्ति ही सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक शक्ति का आधार है। अतः हिंदू समाज को संगठित होकर अपने व्यापार, उद्योग और वित्तीय व्यवस्था को मजबूत करना होगा।



✍️दीपक कुमार द्विवेदी

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