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राजा सूरजमल ने एक सूखा घूँट गले के नीचे उतारते हुए कहा, "हम तो केवल इतना ही चाहते हैं कि श्रीमन्त की मर्जी हम पर बनी रहे।"
राजा साहब, क्या आप एक भी मिसाल दे सकते हैं जिससे हमारी गैरमर्जी का संकेत मिलता हो? हम चम्बल के उस पार थे तभी आपका संदेश आया कि हमारे मुल्क को नुकसान न पहुंचाया जाए । अब आप बताइए, हमारी इतनी बड़ी सेना आपके मुल्क से होती हुई इधर आ गयी, क्या आपके इलाके में किसी को किसी ने हाथ लगाया ? कुम्भेरी की लडाई में तय चौथ के सात लाख रुपये अभी आपकी तरफ से आने बाकी हैं। हमारी फौज को खाने के लाले पड़ रहे हैं, फिर भी क्या हमने आपसे एक कौडी भी माँगी है?
"भाऊसाहब," बीच ही में मल्हारबाबा ने कहा, "जाटों को आपने अपना मित्र माना है। सात-आठ माह पहले उसके द्वार पर पहुँचे हमारे भूखे-बिलखते बाल-बच्चों को इन्होंने सहारा दिया था। इसकी याद में इस अवसर पर आप आधी रकम इन्हें माफ कर दें।"
"मंजूर।" भाऊसाहब ने कहा।
"आनेवाले चार साल तक इनसे चौथ वसूल न की जाय।" जनकोजी ने कहा।
"स्वीकार।"
"इस वर्ष अकाल पड़ा है। गिलचों का संकट भी आ पड़ा है। चार ही नहीं - एक और साल-यानी पाँच साल तक चौथ न वसूली जाय।" सूरजमल ने प्रस्ताव रखा।
"चलो, यह भी मंजूर है।"
"हमारे वकील रूपराम कटारे को पचास-साठ हजार की जागीर मिले।"
"ठीक है। यह भी हमें स्वीकार है।"
भाऊसाहब हँसकर सूरजमल की ओर देखने लगे। सूरजमल ने कहा, "श्रीमन्त, आगरा का किला वैसे तो हमारे ही मुल्क में है! उसे हमारे पास ही रहने दिया जाय।"
"वह तो आज भी लगभग आपके अधिकार में ही है। लेकिन इसके लिए आज सनद बना देना संभव नहीं आज तो हम मिलकर स्वराज्य की रक्षा करते है उसके बाद तो ये सारा इलाका आपका ही होगा, हमे तो पुणे ही जाना है ।
भाऊसाहब की इस साफगोई से सूरजमल राजा थोड़ा नाराज हुआ। गाउँजुद्दीन बीच में बोला कि अभी वक्त है सब तय कर लो जो करना है, युद्ध खत्म होने के बाद कौन किससे पूछनेवाला है?' राजा कुछ झुंझलाया। लेकिन हिम्मत जुटाकर उसने फिर कहा- श्रीमन्त, ठीक है। आपकी सलाह से दिल्ली-आगरा की बातें बाद में तय करेंगे। किन्तु इस समय गाजुद्दीन साहब को हिन्दुस्तान का वजीर घोषित करने में क्या दिक्कत है?"
राजासाहब, जब तक गिलचा अटक पार खदेड़ नहीं दिया जाता, तब तक हिन्दुस्तान हमारे अधिकार में नहीं आता है। जब राज्य ही न हो, तो राज्य का सिरताज अपने माथे पर रखना तो फाग के स्वाँग जैसा हास्यास्पद होगा।"
"श्रीमन्त, आप हमें इस जंग में साथ देनेवाला एकमेव साथी मानते हैं." सूरजमल आग्रहपूर्वक कहने लगा, "तो इतना छोटा-सा यह कार्य निपटाने में ऐसी कौन-सी कठिनाई आनेवाली है?"
भाऊसाहब ने आँखें गड़ाकर गाजुद्दीन को देखा। वजीरी के लिए उसके चेहरे का जरां-जहां मानो दया की भीख माँग रहा था। भाऊ निर्णय नहीं कर पा रहे थे। दो बादशाहों का कपट से कत्ल करनेवाला, 'अब्दाली आया' की अफवाह मात्र सुनते ही दिल्ली छोड़कर भाग जानेवाला, दत्ताजी को बुराड़ी घाट पर अकेला छोड़कर पाला बदलने वाला कपटी, घटिया व्यक्तित्व का मालिक और जिसके पास तक कोई नहीं फटकता, ऐसा आदमी हिन्दुस्तान का वजीर-ए-आलम? नहीं-नहीं! भाऊसाहब धीमी आवाज में किन्तु दृढ़तापूर्वक बोले, "राजासाहब, आप, कुछ भी कहें, लेकिन इस समय तो मैं इस बात का निर्णय कर ही नहीं सकता!"
राजा और गाजीउद्दीन दोनों ही शांत हो गए । विदाई के पान खाकर सूरजमल और गाजुद्दीन उठकर बाहर निकल गये। भाऊसाहब भी अपने रनवासे की तरफ चल दिए । उनका चेहरा साफ बता रहा था कि ऐसे खराब वक्त में सुरजमल को पूरी तरह से समझा न पाने का उन्हें खेद हो रहा है। शिंदे-होलकरों के चेहरों पर भी अपराध-बोध उभर आया था।
दूसरे दिन सुबह महीपत राव दौड़ते हुए आये और कहने लगे, "भाऊसाहब, भाऊसाहऽऽब! बुरा समाचार है सूरजमल जाट नाराज होकर बल्लभगढ़ की ओर सीधे निकल गया है। साथ में गाजुद्दीन भी गया है।"
भाऊसाहब असमंजस में पड़े। फिर गुस्सा होकर बोले, "इतनी जरूरी खबर मुझे रात में ही क्यों नहीं दी?"
"वे कब निकल गये, पता ही न चला। रात में हाथियों के की घण्टियों तक सुनाई न दे इसलिए उन्होंने घण्टियाँ उतार ली थीं और डेरे-डण्डे गिराकर बस चुपचाप चलते बने।"
भाऊसाहब को अतीव दुःख हुआ। सेना में अकाल पड़ने की शिकायतें कल शात से बढ़ती ही जा रही थीं। ऐसे में इस इलाके का एकमेव मित्र का भी साथ जोड़कर चला जाना बहुत ही बुरा था! दाभोलकर और गंगोवा की शक्ल भी मारकासाहब देखना नहीं चाहते थे। किन्तु वक्त बाँका था, तो उन्हें ही काका कहने के अलावा कोई चारा भी भाऊसाहब के पास नहीं था। उन्होंने उन दोनों दीवानों को बुला भेजा। उनके साथ महिपतराव चिटणीस को भी कर दिया। भाऊसाहब ने तीनों से कहा, "जाओ, सूरजमल जो भी कुछ कम-ज्यादा माँगता हो, कबूल कर लो। जसे समझा-बुझाकर हर हालत में वापस ले आओ!"
दूसरे दिन सुबह तीनों खाली हाथ वापस आ गये। महिपतराव ने सिर बटकाकर कहा, "सूरजमल जाट बल्लभगढ़ पहुँच गये हैं। वे काफी नाराज लगते हैं। कुछ भी सुनने को तैयार नहीं हैं। न कुछ बोल ही रहे हैं। वापस भी नहीं आ रहे हैं।"
"न आते हों तो, जाने दो,” भाऊसाहब ने खेदपूर्वक कहा, "जानेवाले को कोई रोक नहीं सकता! जिन्होंने हमसे मुख मोड़ लिया है, उन्हें ही बार-बार मनाने उनके पीछे-पीछे जाने से कोई लाभ नहीं। बहकर चला गया हवा का झोंका अपनी बाँहों भरा नहीं जा सकता। अब तो आनेवाली काली आँधी में से किस तरह आगे आदिना चाहिए, राहें कैसी खोजनी चाहिए, न हों तो नयी राहें कैसे बनायी जायें इसी को विचार करना होगा। भागनेवाले का पीछा करने की बजाय नवोदय का ही स्वागत करना चाहिए।"
स्वराज्य का सपना शिवाजी का महाराज ने देखा था जिसको श्रीमंत बाजीराव ने पूर्ण किया और अबकी इसकी रक्षा की जिम्मेदारी हम मराठों की है । इस युद्ध में जो साथ है उसके साथ, जो साथ नहीं है उसके बिना और जो विरुद्ध है उनसे लड़ते हुए हम हिंदवी साम्राज्य की रक्षा करेंगे ।
#पानीपत_युद्ध
#स्मृति_ताकि_हम_भूले_न
दृश्य साभार : विश्वास पाटिल कृत पानीपत
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