मानवता मानव के साथ बरती जाती है, दानव-दैत्यों के साथ नहीं।


मानवता केवल करुणा और दया तक सीमित नहीं है, बल्कि यह धर्म, सत्य और न्याय के शाश्वत सिद्धांतों पर आधारित होती है। आजकल एक तर्क दिया जाता है कि "सभी धर्म समान होते हैं" और "हमें हिंदू-मुस्लिम जैसे विषयों पर चर्चा नहीं करनी चाहिए।" यह विचार न केवल सतही है, बल्कि भ्रामक भी है। जब कोई समाज स्वयं के अस्तित्व और मूल्यों की रक्षा के प्रति उदासीन हो जाता है, तो वह धीरे-धीरे अपना सब कुछ खो देता है। यदि मानवता का वास्तविक अर्थ समझना है, तो धर्म और अधर्म के बीच की स्पष्ट रेखा को पहचानना आवश्यक है।

अक्सर यह प्रश्न उठाया जाता है कि "आप दिनभर हिंदू-मुस्लिम विषय पर चर्चा करते रहते हैं, क्या आपके पास कोई और कार्य नहीं है?" या फिर "यदि किसी दुर्घटना में कोई घायल हो जाए, तो क्या उसे अस्पताल पहुँचाने वाले को यह देखना चाहिए कि वह हिंदू है या मुस्लिम?" यह तर्क सुनने में भावनात्मक लगता है, किंतु वास्तविकता इससे भिन्न है। जब समाज का अस्तित्व ही खतरे में हो, जब सभ्यता का विनाश किया जा रहा हो, जब धार्मिक अस्मिता मिटाने के प्रयास हो रहे हों, तो क्या इन प्रश्नों का कोई औचित्य रह जाता है?

देव और दानव का भेद: रक्त समान, किंतु विचारधारा भिन्न

इतिहास में यदि देखें, तो देवता और दानव दोनों ही महर्षि कश्यप के पुत्र थे। रक्त समान था, किंतु विचारधारा भिन्न थी। देवता धर्म, सत्य और न्याय के पक्षधर थे, इसीलिए परब्रह्म का समर्थन उन्हें मिला। वहीं, दानव अधर्म के पथ पर चले, अन्याय और अनैतिकता को अपनाया, इसलिए उनका विनाश आवश्यक हो गया। यदि रक्त की समानता से ही गुणों की समानता सिद्ध होती, तो रावण और विभीषण में कोई भेद न होता। किंतु विभीषण ने धर्म का पक्ष लिया, इसलिए श्रीराम ने उन्हें अपनाया, जबकि रावण अपने अहंकार और अधर्म के कारण नष्ट हुआ।

इसी प्रकार, प्रह्लाद और राजा बलि भी असुर वंश से थे, किंतु धर्म के मार्ग पर चलने के कारण वे ईश्वर के प्रिय बने। दूसरी ओर, हिरण्यकशिपु और अन्य असुर अधर्म के कारण नष्ट हुए। इसका स्पष्ट संकेत यही है कि सिर्फ रक्त का संबंध महत्वपूर्ण नहीं होता, बल्कि व्यक्ति का आचरण और विचारधारा ही उसे देवता या दानव बनाते हैं।

क्या हिंदू-मुस्लिम विमर्श अनावश्यक है?

जब हिंदू-मुस्लिम विषय पर चर्चा होती है, तो कुछ लोग इसे समाज में विभाजन की जड़ मानते हैं। किंतु क्या यह सच है? वास्तविकता यह है कि यह संघर्ष कोई नया नहीं है। पिछले 1400 वर्षों में इस्लामी आक्रांताओं ने केवल भारत ही नहीं, अपितु संपूर्ण विश्व में रक्तपात किया, असंख्य सभ्यताओं को नष्ट कर दिया, लाखों निर्दोषों की हत्या की और अनेक मंदिरों को ध्वस्त किया।

कुछ ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार, इस्लामी हमलों के कारण भारत में लगभग 10 करोड़ हिंदुओं का संहार किया गया। भारत विभाजन के समय 20 लाख हिंदुओं को मौत के घाट उतारा गया। यह सब एक विशेष विचारधारा के अंतर्गत हुआ, जो कहती है कि "जब तक एक भी मूर्तिपूजक जीवित रहेगा, तब तक कयामत नहीं आएगी।"

इस्लामी जिहादी मानसिकता के लिए हत्या, लूटपाट, बलात्कार और विध्वंस कोई बड़ी बात नहीं रही। इसका अनगिनत प्रमाण इतिहास में और वर्तमान समय में भी देखे जा सकते हैं। आज भी जब कोई हिंदू अपनी धार्मिक अस्मिता की बात करता है, तो उसे "सांप्रदायिक" कह दिया जाता है, जबकि वास्तविकता यह है कि हिंदू समाज सहिष्णुता के कारण निरंतर आक्रमण सहता रहा है और धीरे-धीरे अपनी भूमि, संस्कृति और अस्तित्व को खोता जा रहा है।

धर्म और मजहब का अंतर: क्या सभी धर्म समान होते हैं?


धर्म का अर्थ केवल आस्था, पूजा-पद्धति या किसी संप्रदाय से नहीं होता, बल्कि धर्म संपूर्ण सृष्टि के संचालन का आधार होता है। धर्म वह सनातन सत्य है, जो इस ब्रह्मांड की मूल व्यवस्था को बनाए रखता है। धर्म वह प्राकृतिक नियम है, जो समाज, जीव-जगत और ब्रह्मांड के संतुलन को सुनिश्चित करता है। धर्म केवल नैतिकता या पवित्रता का विषय नहीं है, बल्कि यह समस्त सृष्टि की संरचना और संचालन का सिद्धांत है।

धर्म और मजहब में मौलिक अंतर यह है कि धर्म शाश्वत और सार्वभौमिक होता है, जबकि मजहब किसी समय विशेष में उत्पन्न एक मत या संप्रदाय होता है। धर्म सत्य, अहिंसा, प्रेम, करुणा, दया, न्याय और कर्तव्यपरायणता के सिद्धांतों पर आधारित होता है, जबकि मजहब किसी विशेष पैगंबर, ग्रंथ या सिद्धांत से बंधा होता है और उसमें परिवर्तन की कोई संभावना नहीं होती।

धर्म को समय, स्थान और व्यक्ति की सीमाओं में नहीं बाँधा जा सकता, क्योंकि यह ब्रह्मांडीय व्यवस्था का अभिन्न अंग है। धर्म वह सार्वभौमिक सत्य है, जो जीवन के प्रत्येक स्तर पर समान रूप से लागू होता है। धर्म का उद्देश्य आत्मोन्नति, मोक्ष और ब्रह्मांड के प्राकृतिक संतुलन को बनाए रखना है।

इसके विपरीत, अब्राहमिक मजहब (इस्लाम, ईसाईयत, यहूदी मत) एक विशेष पैगंबर द्वारा प्रचारित विचारधाराएँ हैं, जिनकी नींव एक पुस्तक, एक ईश्वर और एक विशिष्ट धार्मिक कानून पर आधारित होती है। इनमें सुधार या परिवर्तन की कोई गुंजाइश नहीं होती और इनका प्रमुख उद्देश्य एक मजहबी सत्ता स्थापित करना होता है।

इसलिए, यह कहना कि "सभी धर्म समान होते हैं," एक बौद्धिक मूर्खता है। सनातन धर्म और अब्राहमिक मजहबों की तुलना नहीं की जा सकती, क्योंकि सनातन धर्म ब्रह्मांड का शाश्वत सत्य है, जबकि अब्राहमिक मजहब केवल किसी व्यक्ति विशेष के विचारों पर आधारित होते हैं।

क्या मानवता सभी के साथ समान होनी चाहिए?

कुछ लोग तर्क देते हैं कि हमें सहिष्णु बनना चाहिए, हमें सबके साथ मिल-जुलकर रहना चाहिए। किंतु क्या यह संभव है?

रावण को कितनी भी दया दिखाई जाती, क्या वह सुधर जाता?
औरंगजेब के साथ कितनी भी अहिंसा की नीति अपनाई जाती, क्या उसने अत्याचार बंद कर दिया होता?
क्या 1947 में गांधीजी के अहिंसा के उपदेशों ने हिंदुओं के नरसंहार को रोक लिया था?

अधर्म को सहन करना स्वयं अधर्म के समान ही होता है।

यदि कोई समाज अपनी रक्षा के लिए संघर्ष नहीं करता, तो उसका अस्तित्व खतरे में पड़ जाता है। क्या यह उचित होगा कि एक चोर आपके घर में घुस आए और आप उसे रोकने के बजाय यह सोचें कि "आखिर वह भी तो इंसान है"? यदि कोई समाज अपनी धार्मिक, सांस्कृतिक और नैतिक सुरक्षा के लिए संघर्ष नहीं करता, तो धीरे-धीरे वह नष्ट हो जाता हैं 

मानवता केवल उन्हीं के साथ बरती जानी चाहिए, जो मानवता के सिद्धांतों का पालन करते हैं। दानव-दैत्यों के साथ मानवता नहीं निभाई जाती। जो अधर्म, अन्याय और हिंसा को बढ़ावा देते हैं, उनके प्रति सहानुभूति रखना स्वयं मानवता के विरुद्ध अपराध है।


✍️ दीपक कुमार द्विवेदी ( बाल योगी)

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