आज हिंदू समाज इस्लाम, ईसाइयत और वामपंथ के वैचारिक और सामाजिक हमलों का सामना कर रहा है। इन शक्तियों के षड्यंत्र से बचने के लिए केवल साप्ताहिक हनुमान चालीसा पाठ और वैचारिक विमर्श-टोलियों का निर्माण पर्याप्त नहीं है। यह एक सीमित प्रयास है, जो समस्या का सम्पूर्ण समाधान प्रस्तुत नहीं करता। यदि इन टोलियों को मात्र भीड़ एकत्रित करने तक सीमित कर दिया गया, तो वे अपने उद्देश्य में असफल हो जाएँगी। अतः इन टोलियों को संस्थागत, संगठित और लक्ष्य-आधारित स्वरूप देना अनिवार्य है।
भीड़ और संगठन में अंतर
भीड़ इकट्ठी करना आसान है, परंतु केवल भीड़ किसी समस्या का समाधान नहीं कर सकती। समाधान तब मिलेगा जब—
भीड़ अनुशासित हो,
आत्मरक्षा हेतु प्रशिक्षित हो,
आर्थिक और सामाजिक रूप से सक्षम हो,
लक्ष्य-आधारित हो और
रणनीतिक और वैचारिक रूप से सशक्त हो।
यदि यह सुनिश्चित नहीं किया गया, तो संकट के समय यही भीड़ या तो विधर्मियों के साथ खड़ी मिलेगी या फिर घरों में ताले लगाकर छिप जाएगी। यह स्थिति राष्ट्र और समाज के लिए अत्यंत घातक होगी।
साप्ताहिक हनुमान चालीसा टोलियों की नई भूमिका
यदि साप्ताहिक हनुमान चालीसा टोलियाँ केवल मन्दिरों में भीड़ एकत्रित करने तक सीमित रहती हैं, तो वे समाज के लिए कोई ठोस परिवर्तन नहीं ला पाएँगी। इन टोलियों को एक संगठित और प्रभावशाली संरचना के रूप में विकसित करना होगा, जो समाज की रक्षा और सशक्तिकरण में योगदान दे सके। इसके लिए चार महत्वपूर्ण क्षेत्रों में कार्य करना आवश्यक होगा—
1. स्वरक्षा प्रशिक्षण केंद्रों की स्थापना
समाज को आत्मरक्षा के लिए प्रशिक्षित करना अनिवार्य है। प्रत्येक नगर, मोहल्ले और गाँव में स्वरक्षा प्रशिक्षण केंद्र (Self-Defense Training Centers) स्थापित किए जाने चाहिए।
पुरुषों, महिलाओं और बच्चों को मार्शल आर्ट, शस्त्र संचालन और आत्मरक्षा की तकनीकें सिखाई जाएँ।
विशेष रूप से महिलाओं के लिए आत्मरक्षा शिविरों का आयोजन किया जाए।
युवाओं को सशक्त, अनुशासित और संगठित बनाया जाए ताकि वे किसी भी संकट में समाज की रक्षा कर सकें।
2. संस्कारशालाओं और गुरुकुलों का संचालन
केवल शारीरिक शक्ति ही पर्याप्त नहीं है, समाज को वैचारिक और सांस्कृतिक रूप से भी सशक्त करना होगा। इसके लिए संस्कारशालाएँ और गुरुकुल संचालित किए जाएँ—
प्रत्येक सप्ताह रविवार संध्या 2 घंटे की संस्कारशाला आयोजित हो।
बच्चों को राम, कृष्ण, शिवाजी, महाराणा प्रताप जैसे महापुरुषों के आदर्शों से परिचित कराया जाए।
उन्हें धर्म, नीति, शस्त्र और शास्त्र का ज्ञान दिया जाए।
खेलकूद, युद्धकला, संवाद-कौशल और जीवन प्रबंधन की शिक्षा दी जाए।
3. अखाड़ा संस्कृति का पुनर्जागरण
प्राचीन भारत में अखाड़े केवल शारीरिक प्रशिक्षण केंद्र नहीं थे, बल्कि वे राष्ट्ररक्षा और सामरिक प्रशिक्षण के केंद्र भी थे। इस परंपरा को पुनः जीवित करना होगा—
प्रत्येक गाँव और नगर में अखाड़ों की स्थापना की जाए।
यहाँ युवाओं को कुश्ती, व्यायाम, शरीर-शक्ति, सामरिक युद्धकला और अनुशासन का प्रशिक्षण दिया जाए।
यह अखाड़े हिंदू समाज के संगठित बल के रूप में कार्य करें।
4. हिंदू आर्थिक मॉडल का विकास
केवल शारीरिक और वैचारिक सशक्तिकरण पर्याप्त नहीं है, हिंदू समाज को आर्थिक रूप से भी आत्मनिर्भर बनाना होगा। यदि हमारी आर्थिक रीढ़ मज़बूत होगी, तो हम किसी भी बाहरी प्रभाव से मुक्त रहेंगे।
हिंदू व्यापारियों, उद्योगपतियों और कारीगरों को जोड़कर एक मजबूत आर्थिक संरचना विकसित करनी होगी।
स्थानीय स्तर पर स्वदेशी व्यापार, कौशल विकास और उद्यमिता को बढ़ावा देना होगा।
एक हिंदू इको-सिस्टम तैयार करना होगा, जिसमें हमारी आर्थिक शक्ति हमारी रक्षा के लिए काम करे।
संगठित समाज ही विजयी होगा
केवल कर्मकाण्ड करने से समस्या का समाधान नहीं होगा। एक कांग्रेसी या वामपंथी भी पूजा-पाठ कर सकता है, परंतु उसमें राष्ट्रीय और धार्मिक चरित्र का अभाव रहता है। जब राष्ट्र, धर्म और समाज की रक्षा का प्रश्न उठेगा, तो वही व्यक्ति विधर्मियों के साथ खड़ा मिलेगा। इसलिए यह मान लेना कि केवल साप्ताहिक हनुमान चालीसा पाठ या बौद्धिक विमर्श से कोई ठोस परिवर्तन आएगा, एक भूल होगी।
परिवर्तन तभी आएगा जब—
हर व्यक्ति में राष्ट्र और धर्म की रक्षा का संकल्प जगे।
भीड़ अनुशासित और लक्ष्य-आधारित बने।
हर हिंदू आत्मरक्षा के लिए प्रशिक्षित हो।
आर्थिक, सामाजिक और सामरिक स्तर पर हिंदू समाज संगठित हो।
लंबी लड़ाई के लिए तैयार रहना होगा
यह केवल एक धार्मिक या सांस्कृतिक संघर्ष नहीं है, बल्कि एक वैचारिक और सामरिक लड़ाई है। यदि हिंदू समाज को दीर्घकालिक विजय प्राप्त करनी है, तो उसे—
संगठित होना होगा,
अनुशासित बनना होगा,
संस्थान और संगठन खड़े करने होंगे,
युवा पीढ़ी को शिक्षित और प्रशिक्षित करना होगा।
तभी यह समाज इस्लाम, ईसाइयत और वामपंथ के विध्वंसकारी प्रभावों का सामना कर पाएगा। अन्यथा, भीड़ केवल एकत्रित होकर नारे लगाएगी और फिर तितर-बितर हो जाएगी, जिसका कोई लाभ नहीं होगा।
मोहल्ला-स्तर पर साप्ताहिक "हनुमान चालीसा" पाठ की टोली का गठन करना तथा प्रत्येक ग्राम, नगर एवं मोहल्ले के मंदिरों में श्रद्धालुओं की संगठित उपस्थिति सुनिश्चित करना एक प्रारंभिक चरण हो सकता है, किंतु यह अंतिम समाधान नहीं है। जब तक हम संगठित, अनुशासित, आत्मरक्षा में दक्ष तथा हिंदू समाज को आर्थिक और सामाजिक रूप से सशक्त नहीं बनाते, तब तक इस संघर्ष में विजय प्राप्त करना दुष्कर रहेगा।
हिंदू समाज को इस चुनौती को स्वीकार करते हुए एक नवदिशा में अग्रसर होना होगा—जहाँ हम केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित न रहकर, राष्ट्रीय पुनरुत्थान का वृहद अभियान संचालित करें। यह संघर्ष दीर्घकालिक है, परंतु संगठित एवं सतत प्रयासों से विजय अवश्यंभावी है।
✍️दीपक कुमार द्विवेदी
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