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सत्य, त्याग, समर्पण और धर्म: सनातन जीवन के आधार स्तंभ
मनुष्य का जीवन केवल सांसारिक सुखों की खोज तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आत्मा की उन्नति और परम सत्य की प्राप्ति का माध्यम है। इस यात्रा में सत्य, त्याग, समर्पण और धर्म वे चार स्तंभ हैं, जो जीवन को दिशा और अर्थ प्रदान करते हैं। जब व्यक्ति इन मूल्यों को अपने जीवन में आत्मसात करता है, तब वह न केवल स्वयं को ऊँचाइयों तक ले जाता है, बल्कि समाज और राष्ट्र के कल्याण में भी योगदान देता है।
सत्य केवल शब्दों तक सीमित नहीं, बल्कि यह समस्त सृष्टि का आधार है। वेदों में कहा गया है— "सत्यं ब्रूयात्, प्रियं ब्रूयात्", अर्थात सत्य बोले, किंतु वह प्रिय और मंगलकारी हो। सत्य वह शक्ति है, जो समय की कसौटी पर खरा उतरता है और समस्त सांसारिक परिवर्तनों के बीच भी अडिग रहता है। भगवान श्रीराम ने सत्य की रक्षा के लिए राजसुख को त्यागकर वनवास स्वीकार किया, और राजा हरिश्चंद्र ने सत्य के पालन के लिए अपना संपूर्ण जीवन कष्टों में बिता दिया। महाभारत में धर्मराज युधिष्ठिर को सत्यनिष्ठा के कारण ही स्वर्ग की प्राप्ति हुई। जब व्यक्ति सत्य के मार्ग पर चलता है, तो वह निर्भय रहता है, क्योंकि सत्य ही परमात्मा का स्वरूप है।
धर्म केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक आदर्श व्यवस्था है। यह वह सिद्धांत है, जो समाज को मर्यादित और संतुलित रखता है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा—
"यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥"
अर्थात जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं अवतार लेता हूँ।
धर्म की रक्षा के लिए ही महर्षि दधीचि ने अपनी अस्थियाँ तक दान कर दीं, ताकि उनसे वज्र बनाया जा सके और असुरों का संहार हो सके। इसी परंपरा में गुरु गोविंद सिंह ने धर्म की रक्षा हेतु अपने चारों पुत्रों और अपने स्वयं के जीवन का बलिदान कर दिया। उन्होंने कहा था— "चिड़ियों से मैं बाज लड़ाऊँ, तब गोविंद सिंह नाम कहाऊँ।"
आधुनिक काल में भी अनेक महापुरुषों ने धर्म रक्षा के लिए अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया। जब राम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन अपने चरम पर था, तब उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने राम मंदिर निर्माण के प्रति अपनी अटूट निष्ठा प्रदर्शित की। उन्होंने अपने पद और सत्ता की परवाह न करते हुए स्पष्ट कहा कि "राम मंदिर के लिए यदि कुर्सी भी छोड़नी पड़े, तो मैं पीछे नहीं हटूँगा।" 6 दिसंबर 1992 को जब बाबरी ढांचा गिरा, तब उन्होंने तत्कालीन केंद्र सरकार द्वारा लगाए गए सभी दबावों को नकारते हुए मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया। उनका यह त्याग केवल राजनीतिक निर्णय नहीं था, बल्कि यह धर्म के प्रति उनकी गहरी निष्ठा का प्रतीक था। उनके इस बलिदान ने उन्हें हिंदू समाज में अमर बना दिया।
त्याग केवल सांसारिक वस्तुओं का परित्याग नहीं, बल्कि मोह, अहंकार और स्वार्थ से ऊपर उठने की साधना है। त्याग के बिना व्यक्ति न तो महान बन सकता है और न ही सच्ची शांति प्राप्त कर सकता है। भगवान बुद्ध ने सत्य की खोज में राजसी सुखों का त्याग किया, और स्वामी विवेकानंद ने भारतीय संस्कृति और धर्म के उत्थान हेतु अपना संपूर्ण जीवन अर्पित कर दिया। उनके गुरुदेव श्रीरामकृष्ण परमहंस ने धर्म की सच्ची अनुभूति के लिए संसार का त्याग किया और संपूर्ण जीवन अध्यात्म और साधना में व्यतीत किया।
समर्पण ही जीवन की पूर्णता है। जब व्यक्ति अपने अहंकार, इच्छाओं और व्यक्तिगत स्वार्थों से ऊपर उठकर किसी उच्च उद्देश्य के प्रति स्वयं को अर्पित कर देता है, तब वह सच्चे अर्थों में सिद्धि प्राप्त करता है। भगवान हनुमान संपूर्ण रूप से श्रीराम के प्रति समर्पित थे। उन्होंने कहा—
"राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ विश्राम"
अर्थात जब तक श्रीराम का कार्य पूर्ण न हो जाए, तब तक विश्राम नहीं।
इसी भावना से ओतप्रोत होकर स्वतंत्रता संग्राम के वीरों ने अपने प्राणों की आहुति दी। भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद और नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने राष्ट्र को सर्वोपरि मानते हुए अपने जीवन को मातृभूमि के चरणों में अर्पित कर दिया। वेदों में कहा गया है कि जो धर्म के लिए समर्पित होते हैं, वे अमर हो जाते हैं।
जब सत्य, त्याग, समर्पण और धर्म जीवन में समाहित हो जाते हैं, तब जीवन केवल व्यक्तिगत उपलब्धियों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह संपूर्ण मानवता के कल्याण का माध्यम बन जाता है। सत्य से व्यक्ति को आंतरिक शांति और आत्मबल प्राप्त होता है, धर्म उसे कर्तव्यों की ओर प्रेरित करता है, त्याग उसे उच्चता प्रदान करता है, और समर्पण उसे अमरत्व की ओर ले जाता है। इन चार स्तंभों के बिना न तो कोई समाज स्थिर रह सकता है और न ही कोई राष्ट्र समृद्ध हो सकता है। यही वे सनातन सिद्धांत हैं, जिनके माध्यम से व्यक्ति अपने जीवन को सार्थक बना सकता है और ईश्वर के निकट पहुँच सकता है।
दीपक कुमार द्विवेदी ( बाल योगी)
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