सनातन भारत का महासंग्राम: सांस्कृतिक अस्तित्व की रक्षा और पुनरुत्थान की अनिवार्यता"

भारत केवल एक राष्ट्र नहीं, अपितु एक सनातन सभ्यता है, जिसका अस्तित्व सहस्राब्दियों से अक्षुण्ण बना हुआ है। यह अस्तित्व केवल राजनीतिक शक्तियों की कृपा पर नहीं, बल्कि हिंदू समाज के निरंतर संघर्ष के परिणामस्वरूप सुरक्षित रहा है। विगत हजार वर्षों से यह समाज बाहरी और आंतरिक शत्रुओं से संघर्ष करता आ रहा है। कभी यह संघर्ष इस्लामी आक्रमणकारियों से था, जिन्होंने तलवार के बल पर धर्मांतरण और सांस्कृतिक दासता थोपने का प्रयास किया; कभी यूरोपीय औपनिवेशिक शक्तियों से था, जिन्होंने मानसिक दासता और धर्मांतरण के माध्यम से इस राष्ट्र की आत्मा को कुचलने की चेष्टा की; और अब यह संघर्ष वामपंथी, उदारवादी एवं छद्म धर्मनिरपेक्ष शक्तियों से है, जो हिंदू समाज को आत्मविस्मृति में ढकेलने का प्रयास कर रही हैं।

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भी यह संघर्ष समाप्त नहीं हुआ। कांग्रेस और वामपंथी दलों ने औपनिवेशिक मानसिकता को और अधिक बल प्रदान किया। धर्मनिरपेक्षता के नाम पर हिंदू समाज को विभाजित किया गया, तुष्टिकरण की नीति अपनाई गई, और इतिहास को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत किया गया। इस मानसिक आक्रमण के कारण हिंदू समाज अपनी ही अस्मिता से कटने लगा, और राष्ट्रीय चेतना दुर्बल होती गई।

आलोचना और समालोचना किसी भी समाज की बौद्धिक परंपरा के महत्वपूर्ण अंग होते हैं। किंतु जब कोई महासंग्राम अपने चरम पर हो, तब सेनापति नही बदले जाते। हिंदू समाज सहस्रवर्ष से एक संघर्षरत स्थिति में है, जहाँ यह युद्ध केवल चुनावी विजय या पराजय तक सीमित नहीं है, अपितु भारत के सांस्कृतिक पुनर्जागरण और सनातन धर्म की पुनर्स्थापना का संघर्ष है। यदि 2024 में कांग्रेस गठबंधन की सरकार सत्ता में आ जाती, तो नरेंद्र मोदी सरकार की नीतियों से असंतुष्ट लोगों को भी अभिव्यक्ति का यह अवसर प्राप्त नहीं होता।

राजनीति में स्पष्ट ध्रुवीकरण दृष्टिगोचर होता है। कांग्रेस और वामपंथी दलों की विचारधारा सदैव हिंदुत्व विरोधी रही है। यह केवल राजनीतिक रणनीति नहीं, बल्कि हिंदू समाज को कमजोर करने का सुनियोजित प्रयास है। अहमद पटेल, जो सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार रहे, ने कहा था कि यदि वे सत्ता में आए तो हिंदुत्ववादियों को 100 फीट गहरे गर्त में दफना देंगे, जिससे वे सहस्रवर्ष तक पुनः उठने का साहस न कर सकें। यह कथन केवल एक राजनेता का वक्तव्य नहीं, अपितु हिंदू समाज को चेताने के लिए पर्याप्त संकेत है कि उसका अस्तित्व संकटग्रस्त है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बारंबार "सहस्रवर्षीय भारत" की संकल्पना प्रस्तुत की है। यह केवल विकास योजनाओं तक सीमित नहीं, बल्कि हिंदू सभ्यता के पुनरुत्थान से भी संबंधित है। सभ्यताओं का संघर्ष कुछ वर्षों या दशकों तक सीमित नहीं होता, यह सहस्रवर्ष तक चलता है। इस्लाम, ईसाइयत और वामपंथ ने भारत की सनातन परंपरा पर अनेक आघात किए हैं, और यह प्रक्रिया अब भी जारी है। ऐसे में हिंदू समाज को अपनी सांस्कृतिक अस्मिता के प्रति जागरूक होना आवश्यक है।

इस महासंग्राम की सबसे बड़ी चुनौती केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक और बौद्धिक भी है। यदि हिंदू समाज आत्मसंशय और आत्मविस्मृति का शिकार रहेगा, तो उसकी दुर्बलता स्वाभाविक होगी। समाज को अपनी शक्ति को पहचानते हुए संगठित होना होगा, और राष्ट्रनीति को केवल चुनावी राजनीति तक सीमित रखने के स्थान पर दीर्घकालिक सांस्कृतिक पुनरुत्थान की दृष्टि से देखना होगा। जब समाज सशक्त होगा, तब नेतृत्व भी सशक्त बनेगा और राष्ट्र का उत्थान संभव होगा।

महासंग्राम में धैर्य, संकल्प और रणनीतिक कुशलता आवश्यक होती है। समाज को नेतृत्व पर विश्वास बनाए रखना होगा और राष्ट्र पुनर्निर्माण में अपनी भूमिका निभानी होगी। जब हिंदू समाज अपने गौरव की पुनर्प्राप्ति हेतु जागरूक और संगठित होगा, तभी भारत पुनः विश्वगुरु के पद पर प्रतिष्ठित हो सकेगा।

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