सनातन संस्कृति और संविधान: वर्तमान चुनौतियाँ और समाधान

एक कटु सत्य यह है कि जब हिंदू समाज अपना सब कुछ खो चुका होगा, तब उसे यह समझ आएगा कि किसी किताब के अंधानुकरण से कितना बड़ा अनर्थ हो सकता है। किंतु तब तक बहुत देर हो चुकी होगी। इतिहास साक्षी है कि जब भी किसी समाज ने यथार्थ से हटकर किसी किताब, विचारधारा या सिद्धांत को अंतिम सत्य मान लिया, तब वह अपने अस्तित्व की रक्षा नहीं कर सका।

भारत-विभाजन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। यह केवल राजनीतिक विभाजन नहीं था, बल्कि मानव इतिहास की सबसे भीषण त्रासदियों में से एक थी। 1946 से 1950 के बीच लाखों निर्दोष लोगों का कत्लेआम हुआ, करोड़ों को अपने पूर्वजों की भूमि त्यागकर शरणार्थी बनना पड़ा। यह त्रासदी हिटलर द्वारा यहूदियों को गैस चेंबर में मारने से भी अधिक भयावह थी। किंतु यहूदियों ने अपने इतिहास को कभी मिटने नहीं दिया। उन्होंने हजारों संग्रहालय बनाए, सैकड़ों फिल्मों और पुस्तकों के माध्यम से सत्य को जीवंत रखा। हर यहूदी बालक को अपने इतिहास का बोध कराया जाता है ताकि वह कभी भी अपने समाज की पुनरावृत्ति न होने दे।

इसके विपरीत, भारत में विभाजन के भीषण नरसंहार को योजनाबद्ध रूप से भुला दिया गया। विद्यालयों में इसका उल्लेख नहीं किया गया, इतिहास की पुस्तकों से इसे गायब कर दिया गया, और इसे एक सामान्य राजनीतिक घटना के रूप में प्रस्तुत किया गया। कारण स्पष्ट है—कुछ शक्तियाँ नहीं चाहतीं कि हिंदू समाज अपने अतीत से कुछ सीखे।

भारत की स्वतंत्रता के पश्चात् पश्चिमी विचारधारा से प्रभावित शासनतंत्र ने इस देश को केवल एक भौगोलिक इकाई के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया। यह स्थापित करने का प्रयत्न किया गया कि भारत का वास्तविक जन्म १५ अगस्त १९४७ को हुआ तथा २६ जनवरी १९५० को संवैधानिक व्यवस्था लागू होने के पश्चात् ही नागरिकों को अधिकार प्राप्त हुए। इसके माध्यम से यह मिथ्या प्रचार किया गया कि स्वतंत्रता से पूर्व समाज में केवल कुछ उच्च जातियों का प्रभुत्व था तथा उन्होंने हजारों वर्षों तक अन्य वर्गों का शोषण किया। इस कथित 'नीली पुस्तक' के माध्यम से सत्ता तंत्र ने समाज में ऐसी भ्रांतियाँ उत्पन्न कीं, जिनका उद्देश्य हिंदू समाज को जाति, क्षेत्र, भाषा एवं वर्ग के आधार पर विभाजित करना था, जिससे वह अपनी सांस्कृतिक चेतना को पुनः जागृत न कर सके।

वस्तुतः भारतीय इतिहास का गहन अध्ययन यह दर्शाता है कि भारत एक सनातन राष्ट्र है, जिसका अस्तित्व सहस्राब्दियों से अखंड रूप में विद्यमान रहा है। वैदिक युग से लेकर महाभारतकालीन भारत, मौर्य एवं गुप्त साम्राज्य, राष्ट्रकूट, चोल, पाल तथा प्रतिहारों के कालखंड में भारत एक सुसंगठित एवं उन्नत राष्ट्र के रूप में प्रतिष्ठित था। तत्कालीन शासन व्यवस्थाएँ वर्णाश्रम धर्म पर आधारित थीं, जिनमें प्रत्येक वर्ग की भूमिका स्पष्ट रूप से परिभाषित थी। किंतु ब्रिटिश शासनकाल में 'फूट डालो और राज करो' की नीति के तहत जातिगत विद्वेष को प्रोत्साहित किया गया। १९०१ की जनगणना में ब्रिटिश प्रशासक हर्बर्ट रिस्ले ने पहली बार भारतीय समाज को जातिगत आधार पर वर्गीकृत करने का प्रयास किया, जिससे सामाजिक विघटन को बढ़ावा मिला।

इसी क्रम में १९३२ में ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्जे मैकडोनाल्ड द्वारा 'कम्युनल अवॉर्ड' घोषित किया गया, जिसके अंतर्गत दलितों को हिंदू समाज से पृथक मानते हुए उन्हें विशेष राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने की योजना बनाई गई। महात्मा गांधी ने इसका विरोध किया तथा १९३२ में पूना समझौता हुआ, जिसके अंतर्गत दलितों को हिंदू समाज का ही अंग मानते हुए राजनीतिक प्रतिनिधित्व प्रदान किया गया। यह समझौता स्पष्ट करता है कि भारतीय समाज में तथाकथित जातिगत भेदभाव को अंग्रेजों द्वारा योजनाबद्ध रूप से गहराया गया, जिससे हिंदू समाज आंतरिक रूप से विभाजित हो जाए।

स्वतंत्रता के पश्चात् इसी विभाजनकारी मानसिकता को संवैधानिक स्वरूप दिया गया। भारतीय संविधान सभा में ३८९ सदस्य थे, जिसके अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद थे। संविधान निर्माण की प्रक्रिया में प्रमुख भूमिका डॉ. भीमराव अंबेडकर, डॉ. के.एम. मुंशी, पं. जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, श्यामा प्रसाद मुखर्जी तथा अन्य नेताओं ने निभाई। संविधान सभा में हुए विभिन्न विचार-विमर्शों के आधार पर आरक्षण नीति का निर्धारण किया गया, जो मूलतः पूना समझौते की अवधारणा पर आधारित थी। किंतु वामपंथी इतिहासकारों एवं राजनीतिक षड्यंत्रकारियों ने यह मिथ्या प्रचार किया कि संविधान में आरक्षण की संकल्पना डॉ. अंबेडकर की देन थी, जबकि वास्तविकता यह थी कि इसका आधार पूना समझौता एवं गांधी-सरदार पटेल की सहमति थी।

देश का विभाजन इस्लामी भीड़ ने धर्म के आधार पर किया था, किंतु स्वतंत्र भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित करने के स्थान पर 'धर्मनिरपेक्ष' राज्य बना दिया गया। इस तथाकथित धर्मनिरपेक्षता का उद्देश्य केवल एक था—भारतीय समाज को उसकी धार्मिक एवं सांस्कृतिक जड़ों से पूर्णतः विच्छिन्न करना। १९७६ में ४२वें संविधान संशोधन के माध्यम से 'समाजवाद' एवं 'धर्मनिरपेक्षता' जैसे शब्द जोड़े गए, जिनका मूल संविधान में कोई उल्लेख नहीं था। यह संशोधन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा आपातकाल के दौरान लागू किया गया, जब लोकतांत्रिक प्रक्रिया निलंबित थी तथा संपूर्ण शासनतंत्र निरंकुशता की ओर अग्रसर था। इसका उद्देश्य केवल इतना था कि भारतीय समाज अपनी सांस्कृतिक चेतना से विमुख हो जाए और उसे संवैधानिक प्रावधानों के माध्यम से एक कृत्रिम राष्ट्रवाद के ढाँचे में ढाल दिया जाए।

यही कारण है कि जब भी कोई सत्य के उद्घाटन का प्रयास करता है, तो उसे सांप्रदायिक, रूढ़िवादी अथवा प्रतिक्रियावादी घोषित कर दिया जाता है। आज स्थिति यह है कि 'नीली पुस्तक' को इतना अधिक महिमामंडित किया जा चुका है कि उसकी तुलना धार्मिक ग्रंथों से की जाने लगी है। इस किताब की आलोचना करना निषिद्ध कर दिया गया है; यदि कोई ऐसा करने का प्रयास करता है, तो उसे विधिक दंड का भागी बना दिया जाता है। इस किताब को इतना पवित्र रूप प्रदान कर दिया गया है कि संविधान सभा के प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ बाबासाहेब आंबेडकर जी को पैगंबर के रूप में स्थापित कर दिया गया।

राजसत्ता धर्म के मार्ग का अनुसरण नहीं करना चाहती, क्योंकि धर्म अनुशासन की माँग करता है। यही कारण है कि तथाकथित 'पवित्र नीली पुस्तक' की प्रस्तावना में यह लिखवा दिया गया कि "भारत एक समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष राज्य है।" इस परिभाषा का सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि 'धर्म' एक सनातन सत्य है, जो मनुष्य को कर्तव्यबोध प्रदान करता है। किंतु इस राष्ट्र को 'धर्मनिरपेक्ष गणराज्य' घोषित कर यह सुनिश्चित किया गया कि धर्म का कोई भी प्रभाव शासन व्यवस्था पर न पड़ने पाए। इसका एकमात्र उद्देश्य यह था कि भारतीय समाज अपने धर्म, संस्कृति एवं इतिहास से विमुख हो जाए, जिससे वह आत्मविस्मृति की ओर अग्रसर हो और धीरे-धीरे उसका पतन सुनिश्चित हो जाए।

जो लोग आज तथाकथित 'पवित्र नीली किताब' को सर्वोपरि मान रहे हैं, वे यह नहीं समझ पा रहे कि एक दिन इसी के कारण इतना बड़ा नरसंहार होगा जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता। पहले हिंदू समाज आपस में ही कटेगा और संघर्ष करेगा, तत्पश्चात् बाहरी शक्तियाँ अपना वर्चस्व स्थापित करेंगी। यह सब इसलिए होगा क्योंकि हमने अपने संघर्ष को स्वयं लड़ने के बजाय दूसरों के हाथों में सौंप दिया है। हम अपने इतिहास को भूल चुके हैं और अपनी आने वाली पीढ़ियों को सत्य बताने में असफल रहे हैं।

वर्तमान राजनीतिक नेतृत्व इतिहास-बोध और शत्रु-बोध रखने के बावजूद सत्य स्वीकारने का साहस नहीं कर पा रहा है। वह जानता है कि भारत की मूल पहचान सनातन संस्कृति में निहित है, लेकिन वोट बैंक, अंतर्राष्ट्रीय दबाव और 'धर्मनिरपेक्षता' के नाम पर वह हिंदू राष्ट्र की संकल्पना को अस्वीकार करता है। राष्ट्रवादी नीतियों का दिखावटी समर्थन करते हुए भी वह वास्तविक परिवर्तन से बचता है, क्योंकि उसे वैश्विक आलोचना और सत्ता-संतुलन बिगड़ने का भय है। जब तक नेतृत्व संविधान प्रदत्त 'संवैधानिक राष्ट्रवाद' की सीमाओं से बाहर निकलकर भारत के सनातनी स्वरूप को पुनः स्थापित करने का साहस नहीं दिखाता, तब तक केवल सत्ता परिवर्तन से कोई वास्तविक सुधार संभव नहीं होगा।

हिन्दू समाज का परम दुर्भाग्य यह है कि जिन व्यक्तियों एवं राजनीतिक दलों को उसने अपना राजनीतिक प्रतिनिधि चुनकर राजसत्ता सौंपी, उन्होंने उसी समाज के साथ छल किया। वे अब्राह्मिक विचारधारा से इस सीमा तक प्रभावित हो गए हैं कि हिन्दू समाज का अब्राह्मीकरण—अर्थात् उसे केवल किताबों तक सीमित कर देना—चाहते हैं। किंतु मात्र किताबें किसी समाज की रक्षा करने में सक्षम नहीं होतीं। किसी राष्ट्र का उत्कर्ष तब ही संभव होता है, जब उसके नागरिक अपने इतिहास से शिक्षा ग्रहण करते हैं, संगठित होते हैं तथा अपने अस्तित्व एवं संस्कृति की रक्षा हेतु स्वयं अग्रसर होते हैं। इतिहास हमें सावधान कर रहा है—अब यह हम पर निर्भर करता है कि हम उससे शिक्षा ग्रहण करें अथवा अपने पूर्वजों की त्रुटियों को पुनः दोहराएँ।"

✍️ दीपक कुमार द्विवेदी ( बाल योगी)

टिप्पणियाँ