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सनातन धर्म: चेतना, परंपरा और लोकसंस्कार
सनातन धर्म केवल एक आस्था का विषय नहीं, बल्कि जीवन की सबसे सूक्ष्म अनुभूति है। यह धर्म न तो किसी एक किताब में समाया है, न ही किसी एक व्यक्ति की वाणी में, न ही किसी एक विचारधारा तक सीमित है। यह तो एक प्रवाह है, जो अनादि काल से बहता आ रहा है और अनंत काल तक बहता रहेगा। यह किसी समय विशेष की रचना नहीं, बल्कि स्वयं समय से परे एक सनातन सत्य है।
भारत में धर्म केवल किसी देवता की मूर्ति तक सीमित नहीं है। यहाँ ईश्वर न केवल मंदिरों में, बल्कि कण-कण में समाया हुआ है। वह लोक में भी है, शास्त्र में भी, मूर्ति में भी, निराकार में भी, पीपल के वृक्ष में भी, बहती नदी में भी, खेतों की हरियाली में भी, और आकाश में उड़ते पंछियों में भी। यही कारण है कि भारत में केवल ग्रंथों की पूजा नहीं होती, बल्कि लोक-परंपराएँ भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं। गाँव-गाँव में अलग-अलग लोकदेवता पूजे जाते हैं—डीह बाबा, डीह चौरा माई, संन्यासी बाबा, बरम बाबा, कुल देवता, स्थान देवता, ग्राम देवता। यहाँ हर नदी माँ है, हर पर्वत देवता है, हर वृक्ष में ईश्वर का वास है।
और यही सनातन धर्म की सबसे बड़ी विशेषता है—वह हर जगह है, वह हर किसी के लिए है, और वह हर किसी के भीतर है।
ऊपर वाला या सर्वव्याप्त परमात्मा?
हमने अक्सर सुना होगा—"ऊपर वाला सब देख रहा है।" लेकिन क्या कभी यह विचार आया कि ईश्वर केवल ऊपर ही क्यों? क्या वह केवल आसमान में बैठा कोई शासक है, जो वहाँ से हमें नियंत्रित कर रहा है? क्या वह केवल किसी सिंहासन पर बैठा न्यायाधीश है, जो हमें आदेश देता है और हमारे कर्मों का लेखा-जोखा रखता है? नहीं। यह अवधारणा हमारे धर्म की नहीं है। यह धारणा उन अब्राहमिक विचारधारा की है, जो ईश्वर को केवल एक राजा के रूप में देखती हैं, जो सातवें आसमान में बैठा शासन कर रहा है। लेकिन सनातन धर्म में ईश्वर केवल "ऊपर वाला" नहीं, बल्कि "भीतर वाला" भी है, "बाहर वाला" भी है, "आगे वाला" भी है, "पीछे वाला" भी है। वह दिशाओं से परे है, वह स्थान से परे है, वह समय से परे है।
गीता में श्रीकृष्ण ने कहा—
"अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः।"
अर्थात्, मैं प्रत्येक जीव के हृदय में स्थित हूँ।
तो फिर यह "ऊपर वाला" वाली मानसिकता कहाँ से आई? यह हमारी परंपरा में नहीं थी। यह धीरे-धीरे उन अब्राहमिक मतों के प्रभाव से आई, जो ईश्वर को केवल एक सत्ताधारी के रूप में देखते हैं। यदि हमारे चित्त में यह बात नहीं उभरती कि ईश्वर केवल ऊपर नहीं, बल्कि हर कण-कण में है, तो इसका अर्थ यही है कि हिन्दू चित्त पर अहिन्दू प्रभाव पड़ चुका है।
लोकपरंपरा: धर्म की आत्मा
यह भूमि केवल शास्त्रों की भूमि नहीं, यह केवल वेदों और उपनिषदों की भूमि नहीं, यह केवल दर्शन और तर्क की भूमि नहीं। यह लोक की भूमि है, यह आस्था की भूमि है, यह श्रद्धा की भूमि है। यहाँ धर्म केवल गूढ़ ग्रंथों तक सीमित नहीं, बल्कि लोकगीतों में गूंजता है, नृत्य में थिरकता है, मेले-ठेलों में उमड़ता है, खेतों-खलिहानों में महकता है। यही कारण है कि लोकपरंपरा में धर्म केवल पूजा तक सीमित नहीं, वह जीवन का उत्सव है।
गाँवों में देवी-देवताओं की पूजा किसी एक विशेष विधि से नहीं होती। कहीं पीपल के नीचे दीप जलते हैं, कहीं नदी किनारे मन्नतें मांगी जाती हैं, कहीं किसी वृक्ष को रक्षा सूत्र बांधा जाता है, कहीं अनाज की पहली गठरी देवता को अर्पित की जाती है। छठ पूजा हो, कांवड़ यात्रा हो, गणेशोत्सव हो, दुर्गा पूजा हो, रामलीला हो—ये सब केवल त्योहार नहीं, बल्कि धर्म की जीवंत धारा हैं, जो पीढ़ी दर पीढ़ी बहती आ रही हैं।
विविधता में एकता ही सनातन की पहचान
सनातन धर्म किसी एक किताब, किसी एक व्यक्ति, किसी एक विचारधारा पर निर्भर नहीं। यह विविधताओं का संगम है। यहाँ कोई मूर्ति पूजता है, कोई निराकार ब्रह्म की उपासना करता है, कोई ध्यान करता है, कोई कीर्तन करता है, कोई वेदों का अध्ययन करता है, कोई लोकदेवताओं की पूजा करता है—लेकिन सबका मार्ग एक ही सत्य की ओर जाता है।
यही सनातन की सबसे बड़ी विशेषता है कि यहाँ हर मार्ग स्वीकृत है, हर साधना मान्य है, हर भक्ति स्वीकार्य है। यहाँ कोई यह नहीं कहता कि यही एकमात्र सत्य है और बाकी सब असत्य। यहाँ हर कोई अपनी प्रकृति के अनुसार अपने मार्ग पर चल सकता है। कोई कर्मयोग से, कोई ज्ञानयोग से, कोई भक्तियोग से, कोई ध्यान से, कोई मंत्र से, कोई साधना से—लेकिन अंततः सबका गंतव्य वही है।
अपनी जड़ों की ओर लौटना होगा
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपनी जड़ों को पहचानें। हमें यह समझना होगा कि हिन्दू धर्म केवल कर्मकांडों तक सीमित नहीं, बल्कि वह एक जीवंत चेतना है, जो हर व्यक्ति के भीतर है। हमें अपने लोकदेवताओं को पुनः स्मरण करना होगा, हमें अपनी परंपराओं को पुनः जागृत करना होगा, हमें यह समझना होगा कि ईश्वर केवल सातवें आसमान में नहीं बैठा, बल्कि वह हमारे चारों ओर है, हमारे भीतर है, हमारी साँसों में है, हमारी चेतना में है।
यदि हम अपनी परंपराओं को भूलते गए, यदि हमने अपनी लोकपरंपराओं को छोड़ दिया, यदि हमने अपने कुलदेवताओं को विस्मृत कर दिया, यदि हमने अपने ग्रामदेवताओं का आदर करना बंद कर दिया, यदि हमने यह मान लिया कि ईश्वर केवल "ऊपर वाला" है—तो यह हमारी सबसे बड़ी हार होगी। हमें अपनी चेतना को जागृत करना होगा, हमें अपनी परंपराओं को पुनः स्थापित करना होगा, हमें यह समझना होगा कि हिन्दू धर्म केवल ग्रंथों में नहीं, बल्कि जीवन के हर क्षण में है।
ईश्वर हर जगह है, हर किसी के लिए है
सनातन धर्म की यह व्यापकता ही उसकी महानता है। यह केवल पूजा-पद्धति नहीं, यह केवल दर्शन नहीं, यह केवल कर्मकांड नहीं—यह संपूर्ण जीवन का सत्य है। यह हमें यह नहीं कहता कि ईश्वर केवल ऊपर है, यह हमें यह नहीं कहता कि केवल एक ही मार्ग सत्य है, यह हमें यह नहीं कहता कि केवल एक ही ग्रंथ अंतिम सत्य है। यह हमें यह सिखाता है कि ईश्वर हर कण में है, हर जीव में है, हर दिशा में है, हर साधना में है, हर भक्ति में है।
हमें अपनी इस चेतना को पुनः जागृत करना होगा। यही सनातन धर्म की आत्मा है, यही हिन्दू चित्त की वास्तविक पहचान है।
✍️ दीपक कुमार द्विवेदी (बाल योगी)
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