आर्य आक्रमण सिद्धांत मिथ्या था, यह तथ्य अति पूर्व में ही सिद्ध हो चुका था। तथापि, इस सिद्धांत के नाम पर विगत पंद्रह से बीस वर्षों में समाज के भीतर जो विषाक्तता प्रसारित की गई, उसकी किसी ने कल्पना तक नहीं की थी।
"'मूलनिवासी' नामक मिथ्या अवधारणा के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं अन्य पिछड़ा वर्ग समुदायों के सरल-हृदय जनों में यह भ्रांति उत्पन्न की जाती है कि वे हिंदू नहीं हैं। दुःख की बात है कि समाज के अनेक सुबोध नागरिक इस दुष्प्रचार के प्रभाव में आ जाते हैं।
यहाँ तक कि क्षत्रिय समाज का एक वर्ग यह कहने लगा है कि क्षत्रिय हिंदू नहीं हैं, अपितु क्षात्रधर्म एक स्वतंत्र धर्म है। इस प्रकार की भ्रांतियाँ प्रचारित करने का स्रोत क्या है? विगत 200 वर्षों में ब्राह्मणों के विरुद्ध जो विषाक्त बीज रोपे गए थे, अब उनकी फसल सुसम्पन्न हो रही है। इस विष का प्रभाव ग्राम्य जीवन तक विस्तारित हो चुका है, तथा भविष्य में भी इसी प्रकार के दुष्प्रयास किए जाने की योजना निर्मित हो रही है।
जो कार्य चर्च ने अफ्रीकी राष्ट्र रवांडा में किया था, वही प्रयोग भारतभूमि पर भी किया जा रहा है। दुःखद तथ्य यह है कि हम सभी इस गंभीर षड्यंत्र से अनभिज्ञ रहकर अचेतनावस्था में पड़े हुए हैं।"
कल की गोष्ठी में शैलेन्द्र भैया ने एक महत्वपूर्ण बात कही कि "हम विमर्श की इस संग्राम में प्रतिदिन पराजित होते जा रहे हैं, क्योंकि हम सत्य को सत्य कहने का साहस नहीं करते।" जिन ईसाई मिशनरियों ने अमेरिका से यूरोप तक के मूल निवासियों का पूर्ण उन्मूलन कर दिया, क्या उनसे यह अपेक्षा करना उचित होगा कि वे स्वीकार करेंगे कि मानव सभ्यता आदिकाल से ही अस्तित्व में रही है? यह प्रथम उन्नत सभ्यता नहीं है; इससे भी अधिक उन्नत सभ्यताएँ उत्पन्न हुईं और विनष्ट हो गईं।
उनकी संपूर्ण विचारधारा इस मिथ्या पर आधारित है कि जब समस्त विश्व ईसाई मत को स्वीकार कर लेगा, तब तथाकथित 'जजमेंट डे' अर्थात् प्रलय का दिन आएगा, और तब गॉड (ईश्वर) उनका निर्णय करेंगे तथा स्वर्ग अथवा नर्क में भेजेंगे। उनकी धारणा यहीं पर स्थिर रहती है, और हम उनकी इन मिथ्याओं का खंडन करने में अपनी ऊर्जा व्यर्थ करते रहते हैं।
हम प्रत्येक पूजा, पाठ तथा अनुष्ठान में संकल्प मंत्र का उच्चारण करते हैं, जिसमें कहा जाता है कि इस कल्प की सृष्टि के आदिकाल से वर्तमान तक 1,97,29,49,127 वर्ष व्यतीत हो चुके हैं। हमारे पास प्रमाण उपलब्ध होने पर भी हम यह स्पष्ट रूप से क्यों नहीं कहते कि आर्य बाह्य आक्रमणकारी नहीं थे, अपितु इस भूमि के मूल निवासी ही थे?
हम चर्च, वामपंथी एवं इस्लामिक शक्तियों के समक्ष निर्भीकता से यह प्रश्न क्यों नहीं उठाते कि—
मक्का-मदीना के मूल निवासी कहाँ गए?
ईरान के पारसी समुदाय कहाँ लुप्त हो गए?
इंडोनेशिया के मूल सनातनी अनुयायी कहाँ चले गए?
मिस्र (Egypt) के मूल निवासी, जो सूर्य की उपासना करते थे, आज कहाँ हैं?
यूरोप के वे मूल समुदाय, जो वैदिक संस्कृति से प्रभावित थे, किसने समाप्त कर दिए?
अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया एवं अफ्रीका के मूल निवासियों का संहार किसने किया?
तथाकथित चर्च व मिशनरी संगठन, जिन्होंने समस्त मूलनिवासियों को समाप्त कर दिया, वे हमें यह बताने का दुस्साहस करते हैं कि हम बाहर से आए हुए हैं!
उनका ईश्वर अथवा अल्लाह हुए, इसका कोई प्रमाण उनके पास उपलब्ध नहीं है। अनेक शोधों में यह तथ्य भी सिद्ध हो चुका है कि जीसस नामक कोई व्यक्ति इतिहास में हुआ ही नहीं। इस्लाम की तो चर्चा ही व्यर्थ है, क्योंकि उसकी उत्पत्ति एवं विकास का कोई ऐतिहासिक एवं कालबद्ध प्रमाण नहीं है।
जब तक हम उनके मिथ्या कालबोध पर प्रश्नचिह्न नहीं लगाएंगे, तब तक हम सत्य के विमर्श में विजयी नहीं होंगे। ईसाईयत एवं इस्लाम की संपूर्ण नींव ही इस भ्रांति पर टिकी हुई है कि उनकी सभ्यता ही अंतिम एवं सत्य सभ्यता है। परंतु जैसे ही हम उनके कालबोध पर प्रहार करेंगे, उनकी नींव हिल जाएगी, और उनके सहयोगी वामपंथी एवं अन्य विधर्मी तत्व भी पलायन करने को बाध्य हो जाएंगे।
हम सत्य को निर्भीकता से कहना एवं स्थापित करना सीखें।
आधिदैविक, आधिभौतिक एवं आध्यात्मिक सृष्टि को समझे बिना इतिहास को समझना असंभव है। किसी भी व्यक्ति को यह सिद्ध करने की आवश्यकता होगी कि मात्र छः हजार वर्ष पूर्व ही मानव सभ्यता का जन्म हुआ, और उससे पूर्व समस्त मानव समुदाय बंदर थे—यह एक पूर्णतः असत्य एवं हास्यास्पद कथन है।
ईसाई मिशनरियों ने लोगों को सभ्य बनाने के नाम पर अमेरिका से यूरोप, अफ्रीका से ऑस्ट्रेलिया तक, जहाँ भी अवसर प्राप्त हुआ, वहाँ के मूल निवासियों का संपूर्ण उन्मूलन कर दिया। भारत में भी उन्होंने यही प्रयास किया, किंतु वे यहाँ पूर्णतः सफल नहीं हो सके, क्योंकि भारतीय समाज की मूल संरचना अत्यंत सुदृढ़ थी।
उन्होंने हमारी प्राचीन शिक्षा प्रणाली को ध्वस्त किया, हमारे इतिहास को विकृत किया, वेदों, पुराणों एवं उपनिषदों की मिथ्या व्याख्या की। तथापि, इसके उपरांत भी वे संपूर्ण रूप से सफल नहीं हो सके। इसका एकमात्र कारण था—भारत की सुदृढ़ पारिवारिक व्यवस्था। यद्यपि गुरुकुल समाप्त कर दिए गए, तथापि भारतीय परिवारों में दादी-नानी एवं माता-पिता गुरु के रूप में उपस्थित रहे, जिन्होंने सनातन सिद्धांतों को कहानियों एवं शिक्षाओं के माध्यम से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक हस्तांतरित किया।
अतः अब समय आ गया है कि हम अपने गौरवशाली इतिहास को पुनः प्रतिष्ठित करें, अपने वास्तविक सत्य को उद्घाटित करें एवं विश्व को पुनः सनातन धर्म के दिव्य प्रकाश से आलोकित करें।
✍️ दीपक कुमार द्विवेदी ( बाल योगी)
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