भारत में राजनीति एक बड़ा रोचक नाटक बन चुकी है, जिसमें कुछ किरदार अपने संवाद समय-समय पर बदलते रहते हैं। जो कल संविधान की मूल आत्मा से छेड़छाड़ कर चुके थे, वे आज संविधान की रक्षा का दावा कर रहे हैं। कभी आपातकाल लगाकर लोकतंत्र को जेल में डालने वाले, 42वें संशोधन के जरिए संविधान की प्रस्तावना में "सेक्युलर" और "समाजवाद" जैसे शब्द जबरदस्ती ठूंसने वाले, शाहबानो केस में सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलटने वाले, वही अब संसद में खड़े होकर संविधान की मर्यादा का पाठ पढ़ा रहे हैं।
संविधान की रक्षा के नाम पर सड़कें जाम करना, सरकारी संपत्तियों को जलाना, और हिंसक आंदोलन करना आजकल देशभक्ति का नया पैमाना बन चुका है। नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध में जब शाहीन बाग़ में महीनों तक रास्ता रोका गया, "हम देखेंगे" जैसी जिहादी नज़्में गाई गईं, तब यही लोग इसे "लोकतंत्र की आवाज़" बता रहे थे। जब फरवरी 2020 में ट्रंप के दौरे के समय दिल्ली में सुनियोजित दंगे करवाए गए, तब यह "अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता" थी। और जब किसी ने विरोध में आवाज़ उठाई, तो उसे "फासीवादी" और "संविधान विरोधी" घोषित कर दिया गया।
कृषि कानूनों का विरोध भी कुछ ऐसा ही था। पहले तो सरकार से मांग की गई कि कृषि सुधार किए जाएं, जब सुधार हो गए तो झूठी अफवाहें फैलाई गईं कि किसानों की ज़मीन छीन ली जाएगी। फिर क्या था, तुरंत सड़कें जाम, दिल्ली की सीमाएं सील, और 26 जनवरी को लाल किले पर तिरंगे का अपमान! खालिस्तानी झंडा फहराने की कोशिश हुई, लेकिन यह सब संविधान बचाने के लिए था! आखिरकार, सरकार को कानून वापस लेने पड़े, और सड़क पर कानून पलटने की परंपरा स्थापित हो गई।
2024 के चुनावों से पहले तो हद ही हो गई। अफवाह उड़ाई गई कि भाजपा अगर सत्ता में आई तो संविधान बदल देगी, आरक्षण खत्म कर देगी। नतीजा यह हुआ कि भाजपा 240 सीटों पर सिमट गई। लेकिन मज़ेदार बात यह है कि जिन्होंने खुद संविधान को बदला, वे ही सबसे ज़्यादा शोर मचा रहे हैं कि संविधान खतरे में है।
अब वही तमाशा वक्फ़ संशोधन विधेयक पर देखने को मिल रहा है। सरकार ने पारदर्शिता लाने के लिए वक्फ संपत्तियों पर नियंत्रण बढ़ाने का प्रस्ताव रखा, लेकिन इसका भी विरोध शुरू हो गया। जब संसद में गृह मंत्री अमित शाह जी ने कहा कि "संसद द्वारा पारित कानून को सभी को मानना होगा," तो वही पुरानी धमकियां दोहराई जाने लगीं—देश को शाहीन बाग़ बना देंगे, सड़कों पर उतरेंगे, विरोध करेंगे। संविधान की रक्षा का दावा करने वालों की असलियत यही है कि जब कानून उनके हित में होता है, तो संविधान पवित्र होता है, और जब उनके एजेंडे के खिलाफ होता है, तो संविधान पर हमला बताया जाता है।
विडंबना यह है कि जिस भगवा दल को "संविधान बदलने", "फासीवादी" और "संप्रदायिक" कहकर बदनाम किया जाता है, वही आज तिरंगे का सम्मान और संविधान की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहा है। दूसरी ओर, जिनका इतिहास संविधान को अपने राजनीतिक फायदे के लिए मोड़ने का रहा है, वे आज सबसे बड़े रक्षक बनने का नाटक कर रहे हैं।
संविधान की वास्तविक रक्षा केवल कागजों में या नारों में नहीं होती, बल्कि उसके सिद्धांतों को सही अर्थों में अपनाने और लागू करने से होती है। भीड़तंत्र के बल पर संसद में पारित कानूनों को पलटवाने की प्रवृत्ति संविधान का सम्मान नहीं, बल्कि उसकी अवमानना है। जो लोग संविधान बचाने का नाटक कर रहे हैं, वे असल में अपने स्वार्थों को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। जनता को यह समझना होगा कि संविधान की रक्षा केवल वही कर सकता है, जो कानून और लोकतंत्र की मर्यादाओं का सम्मान करता है, न कि वे जो हर असहमति को हिंसा और अराजकता की आग में झोंकने पर उतारू हैं।
✍️दीपक कुमार द्विवेदी
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