संसद में वक़्फ़ बोर्ड संशोधन विधेयक पर चर्चा के दौरान विपक्षी दलों, विशेषकर पूर्व मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव ने यह दावा किया कि बौद्ध धर्म वेदों और उपनिषदों को स्वीकार नहीं करता, अतः वह हिंदू धर्म से भिन्न है। उन्होंने केंद्रीय मंत्री श्री किरण रिजिजू पर कटाक्ष करते हुए बौद्ध मत को सनातन संस्कृति से अलग सिद्ध करने का प्रयास किया। यह कथन न केवल ऐतिहासिक दृष्टि से असत्य है, बल्कि सनातन परंपरा की मूलभूत एकता पर भी कुठाराघात है।
इतिहास साक्षी है कि सनातन धर्म कोई संकीर्ण संप्रदाय नहीं, बल्कि एक व्यापक दार्शनिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परंपरा है, जिसमें समय-समय पर विभिन्न विचारधाराएँ विकसित हुईं। यह परंपरा किसी एक पंथ, मत या संप्रदाय तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसमें सत्य की खोज के लिए विभिन्न दर्शनों का उद्भव हुआ। सनातन धर्म रूपी विशाल वटवृक्ष से एक ही सत्य, एक ही ज्ञान और एक ही संस्कृति से अनेक मत और बौद्ध, जैन, चार्वाक जैसे दर्शन विकसित हुए। वेदों ने सदैव समावेशी दृष्टिकोण अपनाया और इसीलिए ऋग्वेद में कहा गया— "एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति", अर्थात सत्य एक है, किंतु ज्ञानी उसे विभिन्न रूपों में व्यक्त करते हैं।
बौद्ध और जैन परंपराएँ भी इसी सनातन ज्ञानधारा की शाखाएँ थीं। भगवान बुद्ध ने अपने उपदेशों में आत्मज्ञान, ध्यान और अहिंसा को प्रमुखता दी, जो कि उपनिषदों और योगदर्शन के मूल सिद्धांतों से अभिन्न रूप से जुड़े हुए थे। महावीर स्वामी द्वारा प्रतिपादित जैन सिद्धांत भी वेदों की आध्यात्मिक पृष्ठभूमि से प्रेरित थे। चार्वाक दर्शन, जो ईश्वर, आत्मा और परलोक को नकारता था, वह भी सनातन परंपरा में स्थान पा सका क्योंकि यहाँ वैचारिक भिन्नता को दमन करने के बजाय तर्क और चिंतन के माध्यम से स्वीकार किया जाता रहा।
इतिहास इस तथ्य को भी प्रमाणित करता है कि सनातन परंपरा ने कभी किसी मत को जबरन ग्रहण करने या किसी विचारधारा को दमन करने का प्रयास नहीं किया। भारतीय दार्शनिक परंपरा में श्रमण और वैदिक विचारधाराओं के बीच सदैव संवाद चलता रहा। महाकुंभ जैसे विशाल धार्मिक आयोजनों में बौद्ध, जैन और सिख मतों के लिए विशेष शिविरों की स्थापना की जाती रही, जिससे यह सिद्ध होता है कि ये सभी परंपराएँ सनातन संस्कृति का ही अभिन्न अंग थीं।
किन्तु आज कुछ राजनीतिक और वैचारिक शक्तियाँ इन परंपराओं को सनातन से पृथक दिखाने का प्रयास कर रही हैं। यह प्रयास केवल एक वैचारिक भ्रम नहीं, बल्कि सुनियोजित षड्यंत्र है, जो समाज में कृत्रिम विभाजन को बढ़ावा देने के लिए रचा गया है। बौद्ध, जैन और सिख परंपराओं को संवैधानिक रूप से अल्पसंख्यक घोषित करना इसी षड्यंत्र का एक भाग था, ताकि सनातन समाज को खंडित किया जा सके।
वक़्फ़ बोर्ड संशोधन विधेयक पर चर्चा के दौरान केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू और राज्यसभा सांसद रामदास आठवले ने स्वयं को अल्पसंख्यक बताया। यह कथन न केवल ऐतिहासिक रूप से असत्य है, बल्कि इससे सनातन संस्कृति की अवधारणा को भी ठेस पहुँचती है। जब संसद जैसे मंच पर इस प्रकार के विभाजनकारी वक्तव्य दिए जाते हैं और उनका कोई प्रभावी प्रतिरोध नहीं होता, तो यह एक गंभीर चिंता का विषय बन जाता है।
सनातन धर्म मात्र पूजा-पद्धति तक सीमित नहीं, बल्कि यह एक सनातन विचारधारा है, जो युगों से चली आ रही है और सभी आध्यात्मिक परंपराओं को एक सूत्र में बाँधती है। सनातन परंपरा और श्रमण परंपरा से ही सभी मतों का उद्भव हुआ है और इनमें कोई मौलिक विरोध नहीं है। भारतीय दर्शन में षड्दर्शन के साथ-साथ बौद्ध, जैन और चार्वाक परंपराओं को भी स्थान दिया गया है, जो यह दर्शाता है कि ये सभी परंपराएँ सनातन संस्कृति के ही विविध रूप हैं।
यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज राजनीतिक लाभ के लिए इन परंपराओं को सनातन धर्म से पृथक करने की कोशिश की जा रही है। यदि इस प्रवृत्ति को नहीं रोका गया, तो यह न केवल हमारे सांस्कृतिक ताने-बाने को क्षति पहुँचाएगा, बल्कि राष्ट्रीय एकता पर भी गंभीर प्रभाव डालेगा। अब समय आ गया है कि हम अपनी ऐतिहासिक, दार्शनिक और आध्यात्मिक एकता को पुनर्स्थापित करें और इस कृत्रिम विभाजन के षड्यंत्र का संगठित रूप से प्रतिकार करें।
सनातन संस्कृति केवल धार्मिक अनुष्ठानों की परंपरा नहीं, बल्कि यह एक जीवंत दर्शन है, जो प्रत्येक युग में सत्य और ज्ञान की खोज के लिए मार्ग प्रशस्त करता है। इस संस्कृति की रक्षा केवल सनातन अनुयायियों की ही नहीं, बल्कि उन सभी की जिम्मेदारी है जो इस धरा की सांस्कृतिक समृद्धि और आध्यात्मिक विरासत को संजोने का दायित्व निभाना चाहते हैं। यदि समय रहते इस कृत्रिम विभाजन को नहीं रोका गया, तो यह सनातन संस्कृति के मूल स्वरूप को विकृत कर देगा और समाज को अनावश्यक रूप से विभाजित कर देगा।
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